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खराब पहियों से भी मंगल नाप रहा क्यूरियोसिटी रोवर, अभी भी नासा के आ रहा काम

अमेरिका का क्यूरियोसिटी रोवर, जो पिछले 13 सालों से मंगल ग्रह पर है, खराब पहियों के बावजूद अपना काम कर रहा है।

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Mar 28, 2026
Curiosity rover (Photo - Washington Post)

मंगल ग्रह (Mars) पर पिछले 13 सालों से मौजूद अमेरिका (United States Of America) की अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) का क्यूरियोसिटी रोवर (Curiosity Rover) अब एक घायल योद्धा की तरह दिखता है। हाल में 'मार्स हैंड लेंस इमेजर' की भेजी तस्वीरों में रोवर के एल्यूमीनियम के पहियों में अब बड़े छेद और दरारें साफ देखी जा सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद यह थमा नहीं है। अब रोवर को अक्सर उल्टा चलाया जाता है, जिससे पहियों को पत्थरों के ऊपर से खींचना आसान होता है और घर्षण कम होता है।

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बॉक्सवर्क नामक जटिल इलाके की जांच कर रहा है पूरी

फिलहाल क्यूरियोसिटी रोवर मंगल ग्रह पर बॉक्सवर्क नामक जटिल इलाके की जांच पूरी कर रहा है और अब सल्फेट यूनिट की ओर बढ़ रहा है। क्यूरियोसिटी के जख्मों से सबक लेकर बाद में भेजे गए परसेवेरेंस रोवर (Perseverance Rover) के पहिए क्यूरियोसिटी रोवर की तुलना में ज़्यादा मोटे और टिकाऊ बनाए गए।

उम्मीद से लंबा चले पहिए

क्यूरियोसिटी रोवर के 6 पहियों में से प्रत्येक की मोटाई महज 0.75 मिलीमीटर है। इन्हें एल्यूमीनियम के एक ही ब्लॉक से तराशा गया था। 2012 में लैंडिंग के समय उम्मीद थी कि ये दो साल चलेंगे, लेकिन आज 13 साल और 35.5 किलोमीटर से ज़्यादा की यात्रा के बाद भी ये काम कर रहे हैं। हालांकि लैंडिंग के महज 14 महीने बाद ही मंगल के नुकीले पत्थरों से इनमें छेद होने लगे थे।

धरती से किया गया 'इलाज'

जब पहियों की हालत बिगड़ने लगी, तो नासा ने 'व्हील वियर टाइगर टीम' का गठन किया। यह अपोलो 13 मिशन जैसी संकटकालीन प्रतिक्रिया टीम थी। धरती से एक नया एल्गोरिदम अपलोड किया गया। यह सॉफ्टवेयर हर पहिये की गति को रियल-टाइम में एडजस्ट करता है, जिससे नुकीले पत्थरों पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाता है।

'सेल्फ-सर्जरी' का भविष्य का प्लान

इंजीनियरों ने एक 'इमरजेंसी प्लान' तैयार रखा है जिसे 'मैकेनिकल ऑटोटॉमी' या 'सेल्फ-सर्जरी' कहा जा सकता है। अगर कोई पहिया बहुत ज़्यादा खराब हो जाता है, तो रोवर एक नुकीले पत्थर का इस्तेमाल करके अपने पहिये के क्षतिग्रस्त अंदरूनी हिस्से को खुद ही काटकर अलग कर सकता है। नासा को उम्मीद है कि इस तरह के कड़े कदम की ज़रूरत 2034 से पहले नहीं पड़ेगी।

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