Deadline:डोनाल्ड ट्रंप के सामने ईरान युद्ध को लेकर 1 मई की बड़ी चुनौती है। अमेरिकी संसद की मंजूरी के बिना सैन्य कार्रवाई जारी रखना मुश्किल होगा, जिससे इस युद्ध के तीन संभावित नतीजे सामने आ सकते हैं।
Reckoning: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बेहद ही चुनौतीपूर्ण समय करीब आ रहा है। एक मई की अहम तारीख तक उन्हें ईरान में अमेरिकी सैन्य अभियानों को लेकर अपना अंतिम फैसला लेना है। अमेरिकी वॉर पावर्स एक्ट के तहत बिना कांग्रेस की मंजूरी के वो साठ दिन से ज्यादा सेना को दूसरे देश में तैनात नहीं रख सकते। ऐसे में अब पूरी दुनिया की नजरें उनके अगले कदम पर टिकी हुई हैं कि क्या वो कोई शांति समझौता करने का मन बनाएंगे। या फिर देश के कड़े नियमों को नजरअंदाज करते हुए वैश्विक युद्ध की तरफ अपने कदम बढ़ा कर एक नया खतरा मोल लेंगे।
ट्रंप प्रशासन के पास सबसे पहला और सुरक्षित रास्ता यह है कि वे ईरान के साथ बातचीत करके किसी शांतिपूर्ण समझौते पर पहुंच जाएं। ऐसा करने से खाड़ी देशों में चल रहा भारी तनाव कम होगा और विवादित होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही फिर से सामान्य रूप से शुरू हो सकेगी। युद्ध टलने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को भी बड़ी राहत मिलेगी।
अगर अमेरिकी राष्ट्रपति इस सैन्य अभियान को आगे भी जारी रखना चाहते हैं, तो उन्हें हर हाल में अमेरिकी संसद से आधिकारिक अनुमति लेनी होगी। हालांकि, विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के कड़े विरोध और मौजूदा राजनीतिक माहौल के चलते यह कानूनी विकल्प उनके लिए बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाला है। इसके लिए उन्हें संसद में लंबी बहस का सामना करना पड़ेगा।
अगर हम पुराने इतिहास पर नजर डालें तो कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने इस तरह के कड़े कानून को ज्यादा तरजीह नहीं दी है। ट्रंप भी ऐसा ही कड़ा कदम उठा सकते हैं और बिना इजाजत युद्ध जारी रख सकते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें भविष्य में बड़ी कानूनी और राजनीतिक मुश्किलों का कड़वा घूंट पीना पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की इस चुनौती पर अलग-अलग देशों से मिली-जुली राय सामने आ रही है। ज्यादातर यूरोपीय देश चाहते हैं कि जल्द से जल्द कोई कूटनीतिक समाधान निकाला जाए, ताकि वैश्विक मंदी से बचा जा सके। वहीं, दूसरी ओर खाड़ी के देश इस पूरे घटनाक्रम का अपने स्थानीय व्यापार और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर बहुत चिंतित नजर आ रहे हैं।
आने वाले मई के पहले सप्ताह में अमेरिकी कांग्रेस में होने वाली अहम बहस और बैठक पर पूरी दुनिया की पैनी नजर रहेगी। इसी बड़ी बैठक में वोटिंग से यह तय किया जाएगा कि ट्रंप प्रशासन को आगे के युद्ध के लिए अतिरिक्त बजट और सैन्य मंजूरी मिलती है या नहीं।
इस पूरी जियो-पॉलिटिकल खींचतान का एक बड़ा और छिपा हुआ पहलू सीधे तौर पर चीन से जुड़ा हुआ है। होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसेना की नाकाबंदी से चीन को होने वाली तेल की भारी सप्लाई लगातार प्रभावित हो रही है। कई जानकार मानते हैं कि अमेरिका युद्ध के बहाने चीन को आर्थिक रूप से कमजोर करने की एक बड़ी रणनीति पर काम कर रहा है।