रूस-यूक्रेन युद्ध के 4 साल पूरे होने पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में लाए गए शांति प्रस्ताव पर भारत ने एक बार फिर तटस्थ रुख अपनाया है। जानें क्यों भारत, चीन और ब्राजील समेत 51 देशों ने यूक्रेन द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव पर मतदान से दूरी बनाई और क्या है भारत की कूटनीतिक रणनीति।
Ukraine Peace Resolution: रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को चार साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में शांति लाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया गया, जिस पर भारत ने एक बार फिर अपना पुराना और स्वतंत्र रुख कायम रखा। मंगलवार 24 फरवरी को यूक्रेन की ओर से लाए गए इस 'स्थायी शांति' के प्रस्ताव पर जब वोटिंग हुई, तो भारत ने इसमें हिस्सा नहीं लिया और खुद को मतदान से दूर रखा।
कुल 193 देशों वाली इस महासभा में यूक्रेन के समर्थन में 107 देशों ने वोट दिया, जबकि 12 देशों ने इसका विरोध किया। भारत के साथ-साथ चीन, ब्राजील और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे 51 देशों ने इस पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाए रखी। इन तटस्थ रहने वाले देशों में हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश और श्रीलंका के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका और बहरीन भी शामिल थे।
यूक्रेन द्वारा लाए गए इस मसौदे का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में रहकर युद्ध को खत्म करना और शांति बहाल करना था। इसमें मांग की गई कि युद्ध को तुरंत रोका जाए और यूक्रेन की सीमाओं का सम्मान किया जाए। साथ ही, जेल में बंद सैनिकों की अदला-बदली, आम नागरिकों और बच्चों की सुरक्षित घर वापसी जैसी मानवीय मदद को भी शांति की दिशा में एक जरूरी कदम बताया गया। प्रस्ताव में रूस द्वारा बिजली घरों और आम लोगों के ठिकानों पर किए जा रहे हमलों को लेकर भी गहरी चिंता जताई गई।
भारत का यह फैसला उसकी अपनी उस कूटनीतिक सोच का हिस्सा है, जिसमें वह किसी एक पक्ष का साथ देने के बजाय शांति का रास्ता खोजने पर जोर देता है। भारत शुरू से ही कहता रहा है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और इसे केवल आपसी बातचीत और कूटनीति से ही सुलझाया जा सकता है। मतदान में हिस्सा न लेकर भारत ने यह संदेश दिया है कि वह दोनों पक्षों के बीच संवाद के पक्ष में है ताकि स्थिति को और बिगड़ने से रोका जा सके।