
मिडिल ईस्ट में ईरान-अमेरिका इज़रायल युद्ध (Iran-US Israel War) हो या फिर यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War), तनाव और वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत (India) दुनिया का सबसे ज़्यादा रेमिटेंस (विदेशों से भेजी गई रकम) प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। गल्फ देशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों ने ईरान युद्ध के दौरान अपने परिवारों को और भी ज़्यादा पैसा भेजा है। अप्रैल 2025 की तुलना में अप्रैल 2026 में भारत में भेजी गई रेमिटेंस की राशि में 70% की बढ़ोतरी हुई है।
अप्रैल 2025 में जहाँ 9.4 अरब डॉलर (करीब 89 हज़ार करोड़ रूपए) भारत भेजे गए थे, तो वहीं अप्रैल 2026 में रेमिटेंस में 16 अरब डॉलर (करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए) रेमिटेंस की राशि भारत आई है।
रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार रेमिटेंस भारत के लिए बाहरी वित्तीय स्रोतों का सबसे स्थिर और भरोसेमंद माध्यम है। शेयर बाजार या वैश्विक राजनीतिक तनाव जैसी परिस्थितियों का इस पर अपेक्षाकृत कम असर पड़ता है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 के बाद से सिर्फ 2004, 2005 और 2007 को छोड़कर भारत लगातार दुनिया में सबसे ज़्यादा रेमिटेंस पाने वाला देश बना हुआ है।
विदेश मंत्रालय द्वारा जनवरी 2026 में जारी आंकड़ों के अनुसार गल्फ सहयोग परिषद के 6 देशों में करीब 99.6 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं। इनमें कई लोगों का गल्फ देशों में बिज़नेस है और वो आर्थिक रूप से काफी संपन्न हैं। ऐसे में इस क्षेत्र से भारत को हर साल कई बिलियन डॉलर रेमिटेंस के रूप में प्राप्त होता है। गल्फ देशों से मिलने वाला रेमिटेंस देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय सहारा बना हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2026 के अनुसार वर्ष 2024 में भारत को 137.67 बिलियन डॉलर (उस समय की वैल्यू के अनुसार करीब 11.51 लाख करोड़ रूपए) रेमिटेंस मिला। इससे भारत लिस्ट में शीर्ष पर रहा। यह राशि लिस्ट में भारत के बाद आने वाले तीन देशों मैक्सिको, फिलिपींस और फ्रांस को मिले कुल रेमिटेंस के लगभग बराबर थी।