मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच आधुनिक जंग अब मिसाइलों से आगे बढ़कर इंटेलिजेंस, सैटेलाइट, सिग्नल और AI तकनीक पर निर्भर हो चुकी है। दुनिया की एजेंसियां डेटा, ड्रोन, साइबर निगरानी और ह्यूमन इंटेलिजेंस के जरिए सटीक लोकेशन ट्रैक करती हैं।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ा सवाल सामने आ रहा है। आखिर किसी नेता की सटीक लोकेशन कैसे पता लगाई जाती है? क्या यह सिर्फ सैटेलाइट से संभव है, या मोबाइल सिग्नल से, या फिर अंदरूनी सूत्रों से? आपको बता दें अब युद्ध की असली ताकत मिसाइल और टैंक तक सीमित नहीं रही। अब इंटेलिजेंस, डेटा और एडवांस टेक्नोलॉजी में है। दुनिया की बड़ी खुफिया एजेंसियां जैसे Central Intelligence Agency (CIA), Mossad और National Security Agency (NSA) कई स्तरों पर समन्वित तरीके से काम करती हैं।
हाई-रिजोल्यूशन इमेजिंग सैटेलाइट अब इतने सक्षम हैं कि जमीन पर गाड़ियों की गतिविधि और सुरक्षा काफिलों की मूवमेंट तक ट्रैक कर सकते हैं। लगातार ली गई तस्वीरों से किसी इलाके का पैटर्न समझा जाता है कौन-सी गाड़ी नियमित रूप से किस इमारत तक जाती है, किस जगह अचानक सुरक्षा बढ़ी है, या किस भवन में असामान्य हलचल दिख रही है।
फोन कॉल, रेडियो सिग्नल, इंटरनेट ट्रैफिक और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन का मेटाडेटा आधुनिक निगरानी का अहम हिस्सा है। यह सीधे बातचीत की सामग्री नहीं, बल्कि यह जानकारी देता है कि कौन किससे और किस लोकेशन से संपर्क में है। यदि किसी संवेदनशील इलाके में अचानक कोई डिवाइस सक्रिय या निष्क्रिय होता है, तो वह भी एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण संकेत बन सकता है।
लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले ड्रोन और स्टेल्थ सर्विलांस एयरक्राफ्ट थर्मल कैमरा, नाइट विजन और रडार सिस्टम से चौबीसों घंटे निगरानी कर सकते हैं। लेकिन तकनीक के साथ-साथ ह्यूमन इंटेलिजेंस की भूमिका भी बेहद अहम रहती है। जमीन पर मौजूद स्रोत, सुरक्षा तंत्र की कमजोर कड़ियां या अंदरूनी नेटवर्क से मिली जानकारी कई बार तकनीकी डेटा की पुष्टि करती है।
आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बड़ी मात्रा में सैटेलाइट इमेज, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल डेटा को तेजी से स्कैन कर संदिग्ध पैटर्न पहचानने में मदद करती है। एल्गोरिद्म पहले संभावित संकेतों को छांटते हैं, फिर विश्लेषक उनकी गहराई से जांच करते हैं।
स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्टिविटी आज सुरक्षा के लिए अवसर भी हैं और जोखिम भी। कथित तौर पर कई देशों की एजेंसियां स्पायवेयर, मैलवेयर या नेटवर्क ट्रैकिंग टूल का इस्तेमाल करती रही हैं, हालांकि ऐसे ऑपरेशनों की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती।