Islamic World: ईरान ने अमेरिका और इजराइल को चुनौती देते हुए दुनिया भर के मुसलमानों और इस्लामी देशों से एकजुट होने की अपील की है। मध्य पूर्व के बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने तटस्थ मुस्लिम देशों की चुप्पी पर भी तीखे सवाल उठाए हैं।
Geopolitical Tension: मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव (Middle East Tension) और भू-राजनीतिक उथल-पुथल (Geopolitical Tension) के बीच, ईरान के सर्वोच्च नेता के सलाहकार अली लारीजानी ने ईद से पहले और रमजान की शबे-कद्र के मौके पर दुनिया भर के मुसलमानों (Global Muslims) और इस्लामी देशों (Islamic Nations) की सरकारों के नाम एक बेहद कड़ा और खुला संदेश (Open Message) जारी किया है। इस बयान में ईरान ने न केवल अमेरिका और इजराइल (US and Israel) को खुली चुनौती (Open Challenge) दी है, बल्कि उन मुस्लिम देशों की चुप्पी (Silence of Muslim Countries) पर भी तीखे सवाल उठाए हैं जो इस संकट की घड़ी में तटस्थ (Neutral) बने हुए हैं। लारीजानी के इस आक्रामक रुख (Aggressive Stance) और सीधे आह्वान (Direct Appeal) ने कूटनीतिक हलकों (Diplomatic Circles) में हलचल तेज कर दी है, जिससे अमेरिका और इजराइल भी हैरत में हैं। आइए जानते हैं वो 6 प्रमुख संदेश क्या हैं, जो ईरान ने इस्लामी दुनिया (Islamic World) को दिए हैं:
ईरान को एक धोखेबाज अमेरिकी-ज़ायोनी आक्रामकता का सामना करना पड़ा, जो बातचीत की आड़ में ईरान को खत्म करने की साजिश थी। इस हमले में इस्लामी क्रांति के एक महान नेता, कई नागरिकों और सैन्य कमांडरों की शहादत हुई। हालांकि, इसके बावजूद हमलावरों को ईरानी अवाम के मजबूत राष्ट्रीय और इस्लामी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है।
यह जगजाहिर है कि कुछ सीमित समर्थन को छोड़कर, कोई भी बड़ा इस्लामी देश ईरान के साथ खड़ा नहीं हुआ। लेकिन, ईरानी लोगों ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर हमलावरों को पीछे धकेल दिया है और आज दुश्मन इस रणनीतिक गतिरोध (फंसे हुए हालात) से बाहर निकलने का रास्ता खोजने में असमर्थ हैं।
ईरान "बड़े शैतान" (अमेरिका) और "छोटे शैतान" (इजराइल) के खिलाफ अपने प्रतिरोध के मार्ग पर अडिग है। लेकिन कुछ इस्लामी सरकारों का रुख पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की उस हदीस के बिल्कुल उलट है जिसमें कहा गया है: "जो कोई किसी व्यक्ति को 'ऐ मुसलमानों' पुकारते हुए सुनता है और उसकी मदद नहीं करता, वह मुसलमान नहीं है।" यह आखिर किस तरह का इस्लाम है?
कुछ देशों ने ईरान को अपना दुश्मन मान लिया है क्योंकि ईरान ने उनके क्षेत्रों में मौजूद अमेरिकी और इजराइली हितों को निशाना बनाया। लेकिन जब आपके देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए हो रहा हो, तो क्या ईरान चुप बैठेगा? आज का टकराव अमेरिका-इजराइल और प्रतिरोधक शक्तियों के बीच है। मुस्लिम देशों को तय करना होगा कि वे किस तरफ खड़े हैं।
मुस्लिम देशों को अपने और इस क्षेत्र के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए। यह स्पष्ट है कि अमेरिका कभी आपका वफादार नहीं हो सकता और इजराइल आपका दुश्मन है। ईरान आपके प्रति पूरी तरह ईमानदार है और वह आप पर अपना कोई वर्चस्व या हुकूमत नहीं जमाना चाहता।
इस्लामी उम्माह (समुदाय) की एकता ही सबसे बड़ा हथियार है। अगर सभी देश पूरी ताकत के साथ एकजुट हो जाएं, तो यह एकता सभी इस्लामी देशों के लिए सुरक्षा, प्रगति और पूरी तरह से स्वतंत्रता की गारंटी देने में सक्षम है।
लारीजानी के इन 6 संदेशों का निष्कर्ष यह है कि ईरान खुद को पश्चिमी ताकतों के खिलाफ इस्लामी प्रतिरोध के मुख्य चेहरे के रूप में पेश कर रहा है। वह मुस्लिम देशों को यह कड़ा संदेश देना चाहता है कि पश्चिमी देशों (खासकर अमेरिका और इजराइल) पर निर्भरता उनके भविष्य के लिए खतरनाक है। इस बयान के जरिए ईरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है और मध्य पूर्व में विदेशी ताकतों के प्रभाव को खत्म करने के लिए एक 'एकजुट इस्लामी फ्रंट' बनाना चाहता है। अब यह देखना बेहद अहम होगा कि अन्य खाड़ी और मुस्लिम देश ईरान की इस तीखी अपील पर क्या कूटनीतिक प्रतिक्रिया देते हैं।