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Iran vs US War : वजूद की जंग बनाम नीतिगत फैसले: क्यों अमेरिका के मुकाबले ईरान का पलड़ा भारी है?

Iran America Conflict: क्या मध्य पूर्व के महायुद्ध में हार जाएगा अमेरिका? तेल की बढ़ती कीमतों और घरेलू बगावत के बीच घिरा वॉशिंगटन, वहीं अस्तित्व बचाने के लिए 'करो या मरो' की जंग लड़ रहा है ईरान।
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Jul 19, 2026
Iran vs US War
Iran vs US War: बढ़ता घरेलू दबाव और भारी कीमत: क्या युद्ध से पीछे हटने को मजबूर होगा अमेरिका? (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Iran America Conflict : मिडल ईस्ट (मध्य पूर्व) इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा है। गाजा से लेकर लेबनान और यमन से लेकर तेहरान तक, आसमान से बरसती मिसाइलें सिर्फ तबाही नहीं लिख रही हैं, बल्कि दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका और उसके सबसे भरोसेमंद साथी इजरायल की साख की परीक्षा भी ले रही हैं। लेकिन इस पूरे युद्ध में एक ऐसा पेंच फंस गया है, जिसने पेंटागन से लेकर व्हाइट हाउस तक की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस जंग में प्रतिबद्धता (Commitment) के मामले में ईरान का पलड़ा अमेरिका पर भारी पड़ रहा है।

वजूद की लड़ाई बनाम राजनीतिक नीतियां

जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी (कतर) के जाने-माने विश्लेषक पॉल मसग्रेव के मुताबिक, इस युद्ध की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि यह एक असममित जंग (Asymmetric War) है। एक तरफ जहां अमेरिका और इजरायल इसे अपनी विदेश नीति (Policy Choices) और रणनीतिक दबदबे को बनाए रखने के लिए लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान के शासकों के लिए यह लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि उनके वजूद की है। तेहरान की सत्ता इस वक्त अपने अस्तित्व को बचाने के लिए 'करो या मरो' की स्थिति में है। जब बात जान पर बन आती है, तो पीछे हटने का रास्ता बंद हो जाता है। यही वजह है कि ईरान इस जंग में ज्यादा आक्रामक और अडिग नजर आ रहा है।

चौतरफा घिरे डॉनल्ड ट्रम्प: घरेलू मोर्चे पर भारी दबाव

अमेरिका के लिए यह युद्ध गले की फांस बनता जा रहा है। ऐतिहासिक रूप से जब भी कोई युद्ध लंबा खींचता है और उसमें अमेरिकी जनता का पैसा पानी की तरह बहता है, तो व्हाइट हाउस पर युद्ध से पीछे हटने का दबाव बढ़ जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है:

घर में बगावत: सिर्फ विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ही नहीं, बल्कि खुद सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी के भीतर से भी इस युद्ध के खिलाफ गंभीर आलोचना के स्वर उठने लगे हैं।

महंगाई का झटका: युद्ध के कारण ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिकी नागरिकों को डर है कि अगर तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल भी बढ़ी, तो उनकी जेब पर भारी असर पड़ेगा।

लेकिन ईरान के साथ ऐसा नहीं है। ईरान के नेताओं को इस बात का फर्क नहीं पड़ता कि कच्चे तेल की कीमत क्या है, क्योंकि वे जानते हैं कि अगर वे पीछे हटे, तो उनका अंत निश्चित है।

क्या है मिडल ईस्ट का नया समीकरण?

बढ़ता हुआ 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' (Axis of Resistance):

ईरान अकेले नहीं लड़ रहा है। उसने सालों की मेहनत से लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूथी विद्रोहियों और गाजा में हमास का एक ऐसा नेटवर्क (Proxies) तैयार किया है, जो अमेरिका और इजरायल के लिए नासूर बन चुका है। हालिया हफ्तों में लाल सागर (Red Sea) में हूथी विद्रोहियों द्वारा वैश्विक व्यापारिक जहाजों पर किए गए हमलों ने अमेरिका की नौसैनिक ताकत को खुली चुनौती दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वियतनाम और अफगानिस्तान के युद्धों से अमेरिका ने जो सबक सीखा था, वह यहां भी लागू होता है। एक महाशक्ति के पास हथियारों की कमी नहीं होती, लेकिन जब युद्ध लंबा खिंचता है और घरेलू मोर्चे पर जनता जवाब मांगने लगती है, तो अंततः सुपरपावर को भी कदम पीछे खींचने पड़ते हैं। अब देखना यह है कि क्या अमेरिका इस राजनीतिक चक्रव्यूह से बाहर निकल पाता है या ईरान की अस्तित्व की लड़ाई वाशिंगटन की नीतियों को मटियामेट कर देगी।

(सोर्स: @aljazeera.com)

Updated on:
19 Jul 2026 02:47 pm
Published on:
19 Jul 2026 02:43 pm