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Explainer: इजरायल में कल चुनाव- अगर नेतन्याहू हारे तो भारत पर पड़ेगा क्या असर?

इजरायल के आम चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता दांव पर है। गाजा और ईरान युद्ध, बढ़ती महंगाई और अमेरिका के साथ तनाव के बीच इन चुनावों के नतीजे इजरायल के भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं। जानिए, सत्ता परिवर्तन का भारत-इजरायल संबंधों और पश्चिम एशिया की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है।
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Updated: 26 Oct 2026, 4:17 PM IST
Benjamin Netanyahu Political Future
इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू (Photo-IANS)

Israel Elections 2026: इजरायल के लिए कल यानी 27 अक्टूबर को दिन अहम है और पूरी दुनिया की तरह भारत की नजरें भी इजरायल पर टिकी हैं। कल इजरायल में आम चुनाव हैं, यानी इस यहूदी देश के सबसे विवादित नेता बेंजामिन नेतन्याहू का भविष्य मतपेटियों में बंद होने वाला है। गाजा और लेबनान संघर्ष के साथ ही ईरान युद्ध को लेकर नेतन्याहू सवालों के घेरे में रहे हैं। यहां तक कि इजरायल के सबसे बड़े सहयोगी डोनाल्ड ट्रम्प भी कई मौकों पर नाखुशी जाहिर कर चुके हैं। खबरें तो यह भी आईं कि बेंजामिन नेतन्याहू की लोकप्रियता उनके अपने देश में भी प्रभावित हुई है, लोगों में युद्ध को लेकर नाराजगी है। क्योंकि जबरन थोपे गए संघर्ष का सबसे ज्यादा खामियाजा जनता को ही उठाना पड़ता है।

भारत से अलग है चुनावी प्रक्रिया

अगर इजरायल में सत्ता परिवर्तन होता है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि गाज़ा और पूरे क्षेत्र में चल रहे युद्ध को लेकर नई सरकार का रुख क्या होगा, अमेरिका और यूरोप के साथ उसके संबंध कैसे रहेंगे, और देश का राजनीतिक भविष्य किस दिशा में जाएगा। भारत के लिए इन चुनावों के नतीजे रक्षा सहयोग, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया में उसके व्यापक कूटनीतिक हितों पर असर डाल सकते हैं। चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड का मुकाबला पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाली 'यशार' पार्टी से है।

इजरायल में चुनावी प्रक्रिया भारत की तुलना में काफी अलग है। इसलिए चुनावी परिणाम आने के बाद भी नई सरकार को लेकर स्थिति शायद तुरंत स्पष्ट न हो। भारत में जहां मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देते हैं। वहीं, इजरायल में जनता सीधे किसी उम्मीदवार को नहीं, बल्कि अपनी पसंद की पार्टी को वोट देती है। हमारे यहां संसद लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर बनता है, जबकि इजरायल में एक-सदनीय व्यवस्था है। इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है और इसमें 120 सदस्य होते हैं।

भारत और इजरायल की चुनाव प्रणाली में एक बड़ा अंतर ये है कि हमारे यहां अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र होते हैं। उदाहरण के तौर पर लखनऊ में 2 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र हैं – लखनऊ और मोहनलालगंज। यहां से दो सांसद चुने जाते हैं। इसके उलट इजरायल में पूरे देश को एक ही राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है. पूरे देश में पार्टी को जो वोट प्रतिशत प्राप्त होता है, उसके आधार पर तय होता है कि उसे संसद में एंट्री मिलेगी या नहीं। किसी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट प्राप्त करने होते हैं. सीटों के हिसाब से देखें, तो कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है।

देश मजबूत हुआ, लेकिन लोगों का बिगड़ा बजट 

7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों और उसके बाद गाज़ा में शुरू हुए युद्ध के बाद इजरायल का पहला आम चुनाव है। नेतन्याहू की पार्टी 'लिकुड', दक्षिणपंथी और कट्टर धार्मिक (अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स) पार्टियों - जैसे 'शास' और 'यूनाइटेड तोराह जुडाइज़्म' के समर्थन से सत्ता में बने रहना चाहती है। दूसरी ओर, विपक्ष में ऐसे कई समूह शामिल हैं जिनकी विचारधाराएं भले ही अलग-अलग हैं, लेकिन वे सभी नेतन्याहू को सत्ता से उतारने के लिए साथ आए हैं। कई ओपिनियन पोल बताते हैं कि नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गुट और यहूदी नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला है।

सर्वेक्षणों के अनुसार, विपक्षी गठबंधन को 52 सीटें मिल सकती हैं, जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को 50 सीटें मिलने का अनुमान है। बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यकाल में इजरायल आर्थिक रूप से सशक्त हुआ है, लेकिन जीवन-यापन की लागत बढ़ी है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) में शामिल अन्य देशों के मुकाबले इजरायल में जीवन यापन सबसे महंगा है। खासकर भोजन और आवास की कीमतें बहुत अधिक हैं, जिससे लोगों का बजट बिगड़ रहा है। परचेजिंग पावर के हिसाब से देखें तो, यहां औसत वेतन भी OECD के औसत से कम है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) 38 देशों का संगठन है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया और कनाडा भी शामिल हैं। जानकार मानते हैं, इसका असर नेतन्याहू की पार्टी को मिलने वाले वोटों पर पड़ सकता है।

इजरायल में INDIA जैसा गठबंधन

नेतन्याहू का असली मुकाबला 'यशार' पार्टी प्रमुख गादी आइसेनकोट से है। इसके अलावा, विपक्ष में पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड के नेतृत्व वाला गठबंधन भी शामिल है, साथ ही अन्य ऐसी पार्टियां भी एकजुट हैं जो नेतान्याहू को सत्ता से हटाना चाहती हैं। जैसे भारत का INDIA गठबंधन। नेतन्याहू के लिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता उनके पुराने दक्षिणपंथी और धार्मिक सहयोगियों से होकर गुजरता है, जिनमें इतामार बेन-गवीर और बेज़ालेल स्मोट्रिच के नेतृत्व वाली पार्टियां शामिल हैं। ये सहयोगी इजरायली बस्तियों के विस्तार और फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर इजरायली नियंत्रण मजबूत करने की वकालत करते रहे हैं। अगर बड़ी पार्टियां बहुमत नहीं जुटा पातीं, तो छोटी पार्टियां निर्णायक साबित हो सकती हैं।

इजरायल चुनाव: प्रमुख मुद्दे और भारत पर असर

क्र.एंगलप्रमुख मुद्दाभारत के लिए क्या मायने हैं?
1नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्यबेंजामिन नेतन्याहू की लोकप्रियता, युद्ध और घरेलू असंतोष का चुनाव पर असर।इजरायल की नई सरकार के साथ भारत को अपने रणनीतिक संबंधों की दिशा तय करनी होगी।
2इजरायल की चुनावी प्रक्रियादेशभर में पार्टी आधारित आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और 120 सदस्यीय नेसेट।चुनाव के बाद गठबंधन सरकार बनने में समय लग सकता है, जिससे नीतिगत फैसलों पर असर पड़ सकता है।
3गाजा युद्धहमास के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और युद्ध को लेकर इजरायली जनता की चिंताएं।भारत के लिए क्षेत्रीय स्थिरता, मानवीय मुद्दे और पश्चिम एशिया में अपने हितों का संतुलन जरूरी होगा।
4ईरान के साथ संघर्षईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके खिलाफ इजरायल की सैन्य रणनीति।युद्ध बढ़ने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, तेल की कीमतों और व्यापार मार्गों पर असर पड़ सकता है।
5अमेरिका-इजरायल संबंधनेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प के बीच रणनीतिक मतभेद तथा सैन्य सहयोग का सवाल।अमेरिकी-इजरायली संबंधों में बदलाव का भारत की रक्षा कूटनीति और पश्चिम एशिया की स्थिरता पर प्रभाव पड़ सकता है।
6विपक्ष की रणनीतिगादी आइसेनकोट समेत विपक्षी नेताओं का नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का प्रयास।नई सरकार बनने पर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ इजरायल के संबंधों में बदलाव संभव है।
7इजरायल की अर्थव्यवस्थामहंगाई, आवास और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों से जनता पर आर्थिक दबाव।आर्थिक स्थिरता से भारत-इजरायल व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा मिल सकता है।
8रक्षा सहयोगभारत और इजरायल के बीच रक्षा उपकरणों, सुरक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग के संबंध।सरकार बदलने के बावजूद रक्षा साझेदारी की निरंतरता भारत के लिए महत्वपूर्ण होगी।
9भारत-इजरायल व्यापारवित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच 3.93 अरब डॉलर का व्यापार और प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत।राजनीतिक स्थिरता से व्यापार, निवेश और मुक्त व्यापार समझौते की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
10अरब देशों के साथ संतुलनभारत को इजरायल के साथ करीबी संबंधों के साथ अरब देशों के साथ अपने हित भी सुरक्षित रखने हैं।ऊर्जा आपूर्ति, खाड़ी देशों के साथ व्यापार और वहां रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा महत्वपूर्ण रहेगी।
11लेबनान और सीरियाइजरायल की सैन्य और सुरक्षा नीतियों का व्यापक पश्चिम एशिया पर प्रभाव।क्षेत्रीय तनाव बढ़ने से भारत के व्यापार मार्गों और कूटनीतिक हितों को नुकसान पहुंच सकता है।
12क्षेत्रीय शांति और स्थिरतानई सरकार की युद्ध, कूटनीति और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को लेकर संभावित नीति।भारत के लिए ऐसी क्षेत्रीय स्थिति महत्वपूर्ण होगी, जिसमें रणनीतिक सहयोग बना रहे और संघर्ष का विस्तार न हो।

क्या बहुत कुछ बदल सकता है?

जानकारों का मानना है कि सरकार बदलने का मतलब यह नहीं होगा कि इजरायल की सैन्य और सुरक्षा नीतियों में कोई बड़ा बदलाव आए। नेतन्याहू के विरोधी घरेलू व्यवस्था आदि को लेकर सरकार से नाराज हैं, लेकिन सुरक्षा नीति के मुद्दे पर दोनों पक्षों में काफी समानताएं हैं। दोनों ही मुख्य गठबंधन हमास के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने और ईरान के प्रति सख्त रुख अपनाने के पक्ष में हैं। इसलिए, यह मान लेना कि विपक्ष की जीत से संघर्ष तुरंत खत्म हो जाएगा या क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर इजरायल का नज़रिया पूरी तरह बदल जाएगा, सही नहीं होगा। फिर भी, इन मतभेदों का असर हो सकता है।

आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार संस्थागत सुधारों, सैन्य सेवा की अनिवार्यता और पश्चिमी सहयोगियों के साथ संबंधों को बेहतर बनाने पर अधिक जोर दे सकती है। साथ ही, वेस्ट बैंक से जुड़े मुद्दों पर भी उनका नज़रिया नेतन्याहू के कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगियों से अलग हो सकता है। विदेशी मामलों पर नजर रखने वालों का कहना है कि विपक्ष की जीत से इजरायल में बहुत कुछ नहीं बदलेगा, सिवाय इसके कि इजरायल के अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों में कुछ सुधार आ सकता है।

क्या ट्रम्प चाहते हैं नेतन्याहू की विदाई?

अमेरिका को इजरायल का सबसे बड़ा सहयोगी माना जाता है, लेकिन हाल के दिनों में दोनों के बीच तनातनी बढ़ी है और इसके केंद्र में हैं बेंजामिन नेतन्याहू। लेबनान के मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने नेतन्याहू की खुलकर आलोचना की थी। इसके बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने जो कुछ कहा उससे अमेरिका और नाराज हो गया। नेतन्याहू ने कहा कि वो हर काम डोनाल्ड ट्रम्प के हिसाब से नहीं करते। माना जा रहा है कि अगर इजरायल में नई सरकार अस्तित्व में आती है, तो उसका पहला कदम अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारने पर होगा। ईरान, लेबनान और सीरिया के प्रति इजरायल का रुख पूरे पश्चिम एशिया में स्थिरता की संभावनाओं का भविष्य तय करेगा।

नेतन्याहू जहां अमेरिका से मिलने वाले सैन्य सहयोग को धीरे-धीरे खत्म करना चाहते हैं। वहीं, विपक्ष इसे बनाए रखने के पक्ष में है। ईरान युद्ध को लेकर बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प के बीच मतभेद सामने आए थे। नेतन्याहू का यहां तक कहना है कि इजरायल के पास ऐसी क्षमता होनी चाहिए कि वह अमेरिका की मंजूरी लिए बिना ईरान से मिलने वाले खतरों के खिलाफ कार्रवाई कर सके। इसके विपरीत, आइसेनकोट ने वाशिंगटन के साथ मिलकर एक संयुक्त योजना का प्रस्ताव रखा है। इसका मकसद ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना, उसकी परमाणु क्षमताओं को खत्म करना और कड़ी निगरानी लागू करना है। उनकी रणनीति में सैन्य कार्रवाई की संभावना के साथ-साथ एक मजबूत निरीक्षण प्रणाली भी शामिल है, ताकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू न कर सके। इसलिए अमेरिका भी इजरायल के आम चुनाव पर बारीकी से नजर बनाए हुए है।

भारत के लिए क्या मायने रखते हैं ये चुनाव?

भारत के लिए भी इजरायल के चुनाव काफी महत्वपूर्ण हैं। वैसे तो दोनों देशों के रिश्ते अच्छे रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में संबंध अधिक मजबूत हुए हैं। फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने अपने संबंधों को "शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी" के स्तर तक पहुंचाया। इस साझेदारी में रक्षा, सुरक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, साइबर सुरक्षा, महत्वपूर्ण तकनीकें, कृषि और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्र शामिल हैं। ऐसे में अगर इजरायली नेतृत्व में बदलाव होता है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देशों के सहयोग पर कोई असर पड़ता है?

 वैसे जानकारों का कहना है कि नई सरकार अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा कर सकती है, लेकिन वो पहले से स्थापित द्विपक्षीय संबंधों में रुकावट बने, इसकी उम्मीद कम रहेगी। इसके अलावा, व्यापार भी एक वजह है, जिसके चलते इस चुनाव पर नजर रखना जरूरी है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और इजरायल के बीच 3.93 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जबकि एक प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत जारी रही। चूंकि दोनों देश अपने व्यावसायिक संबंधों को और गहरा करना चाहते हैं, इसलिए राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा काफी मायने रखेगी।

इसके अलावा, इस चुनाव के नतीजे पश्चिम एशिया में भारत के व्यापक कूटनीतिक हितों पर असर डाल सकते हैं। भारत को इजरायल के साथ अपनी करीबी साझेदारी और अरब देशों के साथ अपने व्यापक संबंधों के बीच संतुलन बनाकर चलना होता है। पश्चिम एशिया, भारत की ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार मार्गों और वहां मौजूद लाखों भारतीयों के कल्याण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में अगर ईरान के साथ इजरायल फिर कोई बड़ा सैन्य संघर्ष शुरू करता है, तो परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं और भारत को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस लिहाज से देखें तो भारत की दिलचस्पी इसमें ज्यादा रहेगी कि इजरायल ऐसी सरकार बने, जो रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को बनाए रखते हुए क्षेत्रीय तनाव कम करने में सक्षम हो।

Updated on:
26 Oct 2026, 4:17 PM IST
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