कुछ दिन पहले इजराइल सरकार लेबनान में लिटानी नदी तक कब्जा जमाने का दावा कर रही थी। नेतन्याहू के मंत्री हिज्बुल्लाह को निहत्था करने और संसद से बाहर करने की बात कर रहे थे। लेकिन ट्रंप के एक एलान ने इन सारे बड़े इरादों पर पानी फेर दिया।
दोस्त जब थप्पड़ मारे तो दर्द दुश्मन के वार से भी ज्यादा होता है। इजराइल के साथ इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लेबनान में युद्धविराम का एलान करके नेतन्याहू सरकार को वो झटका दिया जिसकी उम्मीद शायद हमास या हिज्बुल्लाह को भी नहीं थी। इजराइली सरकार के करीबी सूत्र इसे खुलेआम 'थप्पड़' बता रहे हैं।
बस कुछ दिन पहले की बात है। इजराइल की सरकार बड़े दावे कर रही थी कि वो लेबनान में लिटानी नदी तक अपना कब्जा जमाएगी।
नेतन्याहू के मंत्री और दक्षिणपंथी नेता एक के बाद एक बयान दे रहे थे कि लेबनान की सरकार को हिज्बुल्लाह को न सिर्फ निहत्था करना होगा बल्कि उन्हें संसद से भी बाहर निकालना होगा।
यह वही हिज्बुल्लाह है जिसने चुनाव जीतकर लेबनान की संसद में जगह पाई है। लेकिन ट्रंप के एक एलान ने इन सारे बड़े-बड़े इरादों पर पानी फेर दिया।
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर सीधे लिख दिया कि अब हवाई हमले बंद होने चाहिए, बहुत हो गया। यह पोस्ट इजराइल के लिए किसी सार्वजनिक फटकार से कम नहीं था।
भारत में भी जब कोई नेता अपने सहयोगी को सोशल मीडिया पर टोके तो समझ लो रिश्ते में खटास आ गई है। इजराइल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
हालांकि एक बात गौर करने वाली है। ट्रंप ने हवाई हमले रोकने को कहा लेकिन न तो खुद ट्रंप ने और न ही विदेश मंत्री रूबियो ने इजराइल से यह मांग की कि वो जो जमीन पहले से कब्जाई हुई है उसे वापस करे। यही वो एकमात्र रास्ता है जिसे पकड़कर नेतन्याहू अपनी जनता को यह समझा सकते हैं कि देखो हम अभी भी कुछ कर रहे हैं।
लेबनान में जो तबाही हुई है उसकी तस्वीरें देखकर रूह कांप जाती है। पूरे के पूरे शिया बहुल गांव मिट्टी में मिला दिए गए। इजराइल ने इन गांवों को हिज्बुल्लाह का बुनियादी ढांचा बताकर तबाह किया लेकिन असल में यह काम इजराइल के अंदर दक्षिणपंथी वोटरों को खुश करने के लिए किया गया।
वहां के लोगों को अपने घर वापस नहीं जाने दिया जा रहा। जो बचा था उसे भी मलबे में बदल दिया गया। यह सब इसलिए ताकि इजराइल की कट्टरपंथी जनता को यह भरोसा दिलाया जा सके कि सरकार उनकी सुरक्षा के लिए हर कदम उठा रही है।
नेतन्याहू के लिए यह वक्त दोहरी मुश्किल का है। एक तरफ इजराइल की अपनी जनता का एक बड़ा हिस्सा सरकार से नाराज है। लोग पूछ रहे हैं कि इतने हमलों के बाद भी सुरक्षा क्यों नहीं मिली।
दूसरी तरफ सबसे भरोसेमंद दोस्त अमेरिका ने भी सरेआम रोक दिया। क्रिकेट की भाषा में कहें तो नेतन्याहू की टीम को घर और बाहर दोनों मैदानों पर मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है।