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‘वे यह कहकर सत्ता में आए थे कि वे युद्ध में नहीं उलझेंगे’, ईरान से तनाव के बीच अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री ने ट्रंप को घेरा

अमेरिका के पूर्व सेक्रेटरी जॉन केरी ने डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा कि विदेशी युद्धों से बचने और जीवन-यापन की लागत कम करने के उनके वादे नाकाम रहे। उनकी यह तीखी टिप्पणी बढ़ती वैश्विक तनाव और अमेरिका में आर्थिक चिंताओं के बीच आई है।

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Apr 23, 2026
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (Photo-IANS)

ईरान से तनाव बढ़ने के बाद अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर सवाल उठाए हैं। केरी का बयान सीधे तौर पर ट्रंप की नीतियों और उनके वादों पर चोट देता है।

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'अगर मैं ट्रंप की जगह होता तो चिंतित रहता'

जॉन केरी ने साफ कहा कि अगर वह ट्रंप की जगह होते, तो काफी चिंतित रहते। उनका कहना है कि ट्रंप सत्ता में इस वादे के साथ आए थे कि अमेरिका को विदेशी युद्धों से दूर रखेंगे और आम लोगों का खर्च कम करेंगे।

लेकिन केरी के मुताबिक, हकीकत इसके बिल्कुल उलट रही। उनका इशारा बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव और घरेलू महंगाई की तरफ था, जो आम अमेरिकी नागरिकों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है।

वादों और हकीकत के बीच बढ़ती दूरी

केरी का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका कई वैश्विक मुद्दों में उलझा हुआ नजर आ रहा है। चाहे मिडिल ईस्ट का तनाव हो या अन्य अंतरराष्ट्रीय संकट, अमेरिका की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है।

ऐसे में ट्रंप के उस वादे पर सवाल उठना स्वाभाविक है, जिसमें उन्होंने विदेशी युद्धों से दूरी की बात कही थी। केरी ने इसी विरोधाभास को उजागर करने की कोशिश की है।

आम लोगों की जेब पर असर

सिर्फ विदेश नीति ही नहीं, केरी ने आर्थिक मोर्चे पर भी ट्रंप को घेरा। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने महंगाई कम करने और लोगों की जिंदगी आसान बनाने का वादा किया था। लेकिन मौजूदा हालात में आम लोगों पर खर्च का बोझ कम होने के बजाय बढ़ा है। इससे सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठ रहे हैं।

चुनावी राजनीति में गरमाहट

जॉन केरी का यह बयान सिर्फ एक सामान्य टिप्पणी नहीं माना जा रहा। इसे आने वाले चुनावों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। अमेरिका में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, वैसे-वैसे नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज होते जा रहे हैं।

केरी का बयान डेमोक्रेटिक खेमे की रणनीति का हिस्सा भी माना जा सकता है, जहां ट्रंप के वादों और उनके नतीजों की तुलना कर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश हो रही है।

क्या बदलेंगे हालात?

अब सवाल यह है कि क्या इन आलोचनाओं का असर पड़ेगा। ट्रंप के समर्थक अब भी उनके साथ मजबूती से खड़े हैं, जबकि विरोधी उनके फैसलों को लेकर लगातार हमलावर हैं।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता इन दावों और आरोपों को कैसे लेती है। फिलहाल इतना जरूर है कि अमेरिका की राजनीति में बयानबाजी का दौर और तेज होने वाला है।

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