Drone Controversy: ‘एवरेस्ट’ नेपाल और चीन के नियंत्रण वाले तिब्बत के बीच की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित है। पर सुपरपॉवर अमेरिका आखिर क्यों अपना रोबोट एवरेस्ट भेजना चाहता है?
US Drone Controversy Everest: अमेरिका और चीन के बीच की प्रतिस्पर्धा दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट तक पहुंचती नजर आ रही है। इस नई 'जंग' का मैदान बन रहा है नेपाल। चीन ने सबसे पहले एवरेस्ट की चोटी पर अपने भारी भरकम ड्रोन का कामयाब टेस्ट किया था। अब भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचे। यहां अमेरिकी कंपनी 'फ्रीफ्लाई सिस्टम्स अल्टा एक्स जेन 2' के कार्गो ड्रोन का टेस्ट होना था, लेकिन इसे अचानकर रोक दिया गया।
नेपाली अधिकारियों के मुताबिक अमेरिकी टीम ने फ्लाइट टेस्ट के लिए आवश्यक अनुमतियां प्राप्त नहीं की थीं। बेस कैंप पर तैनात दो अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अमेरिकियों ने एवरेस्ट बेस कैंप पर 5,364 मीटर की ऊंचाई पर सिर्फ ड्रोन का प्रदर्शन किया।
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अमेरिका के कार्गो ड्रोन की समुद्र तल पर पेलोड क्षमता 15.88 किलोग्राम है। बताया जा रहा है कि नेपाल को ड्रोन की भू-मानचित्रण की क्षमता और अन्य संवेदनशील कार्यप्रणालियों से चिंता है। एवरेस्ट नेपाल और चीन के नियंत्रण वाले तिब्बत के बीच की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित है। अधिकारियों ने एवरेस्ट पर कमर्शियल ड्रोन ऑपरेशन की अनुमति देने से पहले विस्तृत अध्ययन करने की सलाह दी है।
नेपाल ने पिछले साल चीनी कंपनी डीजेआइ के भारी-भरकम ड्रोन को एवरेस्ट पर कमर्शियल तौर पर उड़ाने की अनुमति दी थी। यह ड्रोन 6,130 मीटर की ऊंचाई यानी कैंप I तक पहुंचा जो कि बेहद खतरनाक खुंबू आइसफॉल के ठीक ऊपर स्थित है। इसने -25 डिग्री और 45 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार वाली हवा के बीच हर उड़ान में 15 किलोग्राम तक का सामान पहुंचाया था।
नेपाल की मीडिया के मुताबिक, अमेरिकी कंपनी ने तो एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए एक रोबोट भेजने का भी प्रस्ताव रखा है, जिसने नेपाली अधिकारियों को चौंका दिया है। इस योजना पर अभी विचार नहीं हो रहा क्योंकि नेपाल में फिलहाल ऐसा कोई कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है जो किसी रोबोट को को एवरेस्ट पर चढ़ने का प्रयास करने की अनुमति देता हो।