पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन द टाइम्स ऑफ इजरायल की रिपोर्ट में पाकिस्तानी फौज की दोहरी नीति को उजागर किया गया है। दशकों से डबल गेम खेलने वाले देश पर भरोसा करना मुश्किल है।
पाकिस्तान आज अमेरिका और ईरान के बीच बिचौलिया बनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जो देश खुद दशकों से दोहरा खेल खेलता आया है, उस पर कोई भरोसा क्यों करे?
इजराइल के मशहूर अखबार 'द टाइम्स ऑफ इजरायल' ने एक रिपोर्ट में पाकिस्तानी फौज की असली तस्वीर सामने रखी है। और यह तस्वीर बेहद चौंकाने वाली है।
पत्रकार हसन मुजतबा ने अपनी रिपोर्ट में एक पुरानी और मशहूर बात का जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि दुनिया के ज्यादातर देशों में सरकार के पास अपनी सेना होती है, लेकिन पाकिस्तान का मामला उल्टा है।
वहां सेना के पास एक देश है। यह बात सुनने में भले ही पुरानी लगे, लेकिन आज के हालात में इसकी अहमियत और भी बढ़ जाती है।
रिपोर्ट में याद दिलाया गया कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद शहर में पकड़ा गया था। वह शहर जहां पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी है। तब भी यह सवाल उठा था कि क्या पाकिस्तानी फौज को इसकी खबर नहीं थी?
इसके अलावा रिपोर्ट में यह आरोप भी लगाया गया है कि पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख मिर्जा असलम बेग के दौर में ईरान को परमाणु तकनीक की जानकारी दी गई थी।
परवेज मुशर्रफ के वक्त तो यह बात खुलकर सामने आई कि पाकिस्तान अमेरिका से पैसे लेकर भी आतंकवाद के खिलाफ जंग में ईमानदार नहीं था।
पाकिस्तान की विदेश नीति का सबसे बड़ा खेल यही है कि वह एक तरफ ईरान के शिया शासन से दोस्ती रखता है और दूसरी तरफ ईरान के बलूचिस्तान इलाके में सुन्नी समूहों पर भी उसकी पकड़ मानी जाती है। रिपोर्ट कहती है कि यह दोनों तरफ दांव लगाने की नीति पाकिस्तान की पुरानी आदत है।
देश के अंदर भी हालात तनावपूर्ण हैं। पाकिस्तान में इमामिया स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन जैसे शिया संगठनों का नाम कई बार अमेरिका और इजरायल से जुड़े मामलों में हिंसक प्रदर्शनों से जोड़ा गया है। इन हालात को देखते हुए खुद पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर को शिया धर्मगुरुओं को चेतावनी देनी पड़ी कि वे हिंसा से दूर रहें।
रिपोर्ट में पाकिस्तान के दोहरे मापदंड का एक और उदाहरण दिया गया है। चीन के शिनजियांग में उइगर मुसलमानों पर जो जुल्म हो रहा है, उस पर पाकिस्तान हमेशा चुप रहता है। बल्कि रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीनी अधिकारियों ने उइगर समूहों से बात करने के लिए पाकिस्तान के नेता काजी हुसैन अहमद की मदद मांगी थी।
चीन के साथ पाकिस्तान के रिश्ते को वह खुद "हिमालय से ऊंचा और समुद्र से गहरा" कहता है। लेकिन इस दोस्ती की कीमत वहां के मुसलमान चुका रहे हैं, इस पर इस्लामाबाद कभी नहीं बोलता।
रिपोर्ट में 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का भी जिक्र है। उस दौर में पाकिस्तानी फौज की करतूतों को रिपोर्ट में "मिनी होलोकॉस्ट" कहा गया। और साफ लिखा गया कि पाकिस्तान ने आज तक बांग्लादेश से इसके लिए माफी नहीं मांगी।
अब जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा है तो पाकिस्तान बीच में कूदने की कोशिश कर रहा है। लेकिन रिपोर्ट का साफ कहना है कि जब तक इजरायल और ईरान जैसे मुख्य पक्ष इस कोशिश को मान्यता नहीं देते, तब तक पाकिस्तान की यह भूमिका महज एक दिखावा है।
रिपोर्ट यह भी चेताती है कि अगर ईरान में कोई बड़ा बदलाव आता है तो उसकी सबसे ज्यादा आंच पाकिस्तान के बलूचिस्तान पर पड़ेगी, जहां पहले से बगावत की आग सुलग रही है।
पाकिस्तानी फौज दुनिया भर में अपनी सेवाएं बेचती रही है, सऊदी अरब हो या खाड़ी के दूसरे देश। यही वजह है कि 'टाइम्स ऑफ इजरायल' ने उसे \भाड़े के सैनिकों जैसा बताया है जो जहां फायदा हो, वहां काम करते हैं।