Conflict: सीरियाई सेना और कुर्द नेतृत्व वाले SDF के बीच हुए युद्धविराम ने क्षेत्र में तनाव कम किया है। तेल संसाधनों और स्वायत्तता को लेकर चल रहा यह संघर्ष अब कूटनीतिक मोड़ पर है।
Diplomatic: मध्य-पूर्व के अशांत देश सीरिया के उत्तर-पूर्वी हिस्से से बड़ी कूटनीतिक सफलता (Diplomatic) की खबर आ रही है। एक महीनों से जारी हिंसक झड़पों के बाद, सीरियाई सरकारी सेना और कुर्द नेतृत्व वाली सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेस (SDF) के बीच एक महत्वपूर्ण 'युद्धविराम' (Kurdish SDF vs Syrian Army) समझौता हुआ है। इस समझौते (Ceasefire) का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में बढ़ता मानवीय संकट रोकना और बातचीत के लिए जमीन तैयार करना है।
सीरिया में सरकार और कुर्द बलों के बीच संघर्ष दशकों पुराना है, लेकिन हालिया विवाद के पीछे तीन मुख्य कारण रहे हैं:
स्वशासन का अधिकार: कुर्द समुदाय उत्तर-पूर्वी सीरिया (रोजावा) में अपनी एक स्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था चाहता है, जिसे दमिश्क सरकार 'देश के बंटवारे' के रूप में देखती है।
संसाधनों पर कब्जा: सीरिया के अधिकतर तेल भंडार और उपजाऊ कृषि भूमि इसी कुर्द-नियंत्रित क्षेत्र में हैं। राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार इन संसाधनों को वापस पाकर अपनी बदहाल अर्थव्यवस्था सुधारना चाहती है।
सुरक्षा और विचारधारा: कुर्द बल 'लोकतांत्रिक संघवाद' की बात करते हैं, जबकि सीरियाई प्रशासन एक केंद्रीकृत शासन व्यवस्था का समर्थक है।
इस युद्धविराम को अमली जामा पहनाने में रूस ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। चूंकि रूस सीरियाई सरकार का सबसे बड़ा सहयोगी है, उसने कुर्द नेतृत्व को इस बात पर राजी किया है कि लगातार युद्ध से केवल तुर्की जैसे पड़ोसी देशों को फायदा होगा। वहीं, अमेरिका के लिए भी यह एक जटिल स्थिति है, क्योंकि वह कुर्द लड़ाकों का समर्थन करता रहा है, लेकिन क्षेत्र में स्थिरता भी चाहता है।
फिलहाल सीमावर्ती शहरों जैसे कामिशली और हसाका में तोपें शांत हो गई हैं। स्थानीय नागरिकों के लिए यह एक बड़ी राहत है, जो महीनों से बंकरों में रहने को मजबूर थे। हालांकि, जानकारों का कहना है कि जब तक सीरिया के नए संविधान में कुर्दों की राजनीतिक स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक यह युद्धविराम 'कच्चे धागे' की तरह है जो कभी भी टूट सकता है।
इस घटनाक्रम पर संयुक्त राष्ट्र (UN) ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि यह समझौता सीरिया में शांति बहाली की दिशा में एक 'आवश्यक कदम' है। दूसरी ओर, तुर्की ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है, क्योंकि वह SDF को एक आतंकवादी समूह मानता है। स्थानीय कुर्द नेताओं का कहना है कि वे शांति चाहते हैं, लेकिन अपनी स्वायत्तता से समझौता नहीं करेंगे। सीरियाई रक्षा मंत्रालय ने इसे 'राष्ट्र की अखंडता' की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया है।
आपातकालीन बैठक: अगले सप्ताह जिनेवा या मॉस्को में दोनों पक्षों के बीच पहले दौर की औपचारिक बातचीत हो सकती है।
मानवीय सहायता: युद्धविराम के बाद अब अंतरराष्ट्रीय सहायता समूहों (NGOs) ने प्रभावित क्षेत्रों में भोजन और दवाइयां पहुंचाने की योजना बनाई है।
अमेरिकी सेना की वापसी: इस नए समझौते के बाद सीरिया में मौजूद अमेरिकी सैनिकों की भूमिका और उनकी संभावित वापसी को लेकर वाशिंगटन में बहस तेज होने की उम्मीद है।
बहरहाल, इस पूरे विवाद का एक 'डार्क एंगल' तेल की तस्करी और ब्लैक मार्केट है। युद्ध के दौरान तेल के कुओं पर नियंत्रण को लेकर कई बार स्थानीय कबीलों और सेना के बीच झड़पें हुईं। कहा जा रहा है कि पर्दे के पीछे एक वित्तीय समझौता भी हुआ है, जिसके तहत तेल से होने वाली कमाई का एक निश्चित हिस्सा दमिश्क सरकार को दिया जाएगा। यदि यह 'तेल-डिप्लोमेसी' सफल रहती है, तो यह युद्धविराम लंबे समय तक टिक सकता है।