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Iran War: रूस-चीन नहीं, उत्तर कोरिया बना ईरान का मददगार? अमेरिका-इजरायल की बढ़ाई मुश्किलें, रिपोर्ट में खुलासा

Iran missile program: रिपोर्ट के मुताबिक ईरान की मिसाइल ताकत के पीछे उत्तर कोरिया की बड़ी भूमिका सामने आई है। जानिए कैसे इस सहयोग ने अमेरिका-इजरायल के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।
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Apr 07, 2026
Iran Missiles
मध्य-पूर्व में अमेरिका-इजरायल से जंग में ईरानी मिसाइलें। (फोटो: IANS)

North Korea’s Crucial Role in Iran’s Military Build-Up: ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले को एक महीने से अधिक हो चुका है, लेकिन मध्य-पूर्व में तनाव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। अमेरिका और इजरायल को भी अंदाजा नहीं था कि उनके हमलों का ऐसा पलटवार होगा, जिससे न सिर्फ दुनिया के कई देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ेगा, बल्कि यह जंग उनके लिए भी गले की फांस बन जाएगी। लेकिन क्या आपको पता है कि इस जंग में जिन हथियारों के दम पर ईरान ने अमेरिका और इजरायल जैसे देशों को चुनौती दी है, वे रूस या चीन से नहीं, बल्कि किसी अन्य देश की मदद से हासिल किए गए हैं?

दरअसल, इसको लेकर ‘जेरूसलम टाइम्स’ ने टेक्सास स्थित एंजेलो स्टेट यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ सिक्योरिटी स्टडीज के प्रोफेसर ब्रूस ई. बेक्टोल की अमेरिकी मीडिया से बातचीत पर आधारित रिपोर्ट को प्रमुखता दी है। ब्रूस के अनुसार, ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल भंडार का एक बड़ा हिस्सा या तो उत्तर कोरिया से खरीदा गया है या उसमें उत्तर कोरिया द्वारा विकसित तकनीक शामिल है।

उन्होंने दावा किया कि इस संबंध में उत्तर कोरिया हमेशा विक्रेता और ईरान खरीदार रहा है। ईरान अपनी सैन्य जरूरतों के लिए उत्तर कोरिया को नकद और तेल के रूप में भुगतान करता है। इस तरह दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत एक-दूसरे की पूरक बन गई हैं।

हथियारों की कॉर्बन कॉपी

ब्रूस ई बेक्टोल के मुताबिक, ईरान की अधिकांश मिसाइल प्रणालियां उत्तर कोरिया के हथियारों की कॉर्बन कॉपी हैं। ईरान की शाहाब-3 मिसाइल पूरी तरह उत्तर कोरिया की ‘नो डोंग’ मिसाइल प्रणाली पर आधारित है। 1990 के दशक में उत्तर कोरिया ने ईरान को सैकड़ों मिसाइलें दीं और बाद में ईरान में ही उनके निर्माण के लिए कारखाने स्थापित करने में भी मदद की।

आज जो मिसाइलें इजरायल और खाड़ी देशों के लिए खतरा बनी हुई हैं, उनके पीछे उत्तर कोरियाई इंजीनियरों और तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका है। उत्तर कोरिया ने ईरान को इमाद और गद्र मिसाइल प्रणालियों के विकास में भी मदद की, जिनका उपयोग इजरायल के साथ-साथ खाड़ी देशों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।

मुसुदान मिसाइल का भी उल्लेख किया गया है, जिसे ह्वासोंग-10 (Hwasong-10) के नाम से जाना जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने इस मिसाइल का उपयोग अमेरिका-ब्रिटेन के सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया को निशाना बनाने के लिए किया था। दागी गई दो मिसाइलों में से एक विफल हो गई थी, जबकि अमेरिकी युद्धपोत ने दूसरी मिसाइल को इंटरसेप्ट कर लिया था। बताया जाता है कि 2005 में ईरान ने इसकी 19 इकाइयां उत्तर कोरिया से प्राप्त की थीं।

ICBM की ओर ईरान के कदम

जेरूसलम टाइम्स में इजरायल के ‘अल्मा रिसर्च एंड एजुकेशन सेंटर’ की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है। इसमें बताया गया है कि वर्तमान में ईरान के पास 1000 से 3000 किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइलों का बड़ा जखीरा है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि ईरान अब लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास के उन्नत चरण में पहुंच चुका है। भविष्य में ईरान दुनिया के किसी भी कोने को निशाना बनाने में सक्षम हो सकता है। उत्तर कोरिया के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी उसे एक ऐसी सैन्य शक्ति में बदल रही है, जो आने वाले समय में पश्चिमी देशों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

Updated on:
07 Apr 2026 10:02 pm
Published on:
07 Apr 2026 10:02 pm