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अमेरिका-ईरान युद्ध में नया मोड़! 2018 की न्यूक्लियर डील पर बुरी तरह फंसे ट्रंप

US-Iran War Update: यूएस ने ठीक 8 साल पहले वर्ष 2018 में जिस न्यूक्लियर डील ‘जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन’ से खुद को बाहर किया था, वही अब 2026 में उनके लिए बड़ी चुनौती बनती दिख रही है।

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Apr 26, 2026
फोटो में अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप और ईरान के सुप्रीम लीडर मुजतबा खामनेई (इमेज सोर्स: ANI)

US-Iran Nuclear Deal 2018: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक पुराना फैसला फिर से चर्चा में आ गया है। यूएस ने ठीक 8 साल पहले वर्ष 2018 में जिस न्यूक्लियर डील ‘जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन’ से खुद को बाहर किया था, वही अब 2026 में उनके लिए बड़ी चुनौती बनती दिख रही है। उस समय (अपने पहले कार्यकाल 2017 से लेकर 2021 तक) ट्रंप का मानना था कि यह डील कमजोर है, इसमें उसका कोई फायदा नहीं है।

लेकिन अमेरिका के बाहर निकलते ही हालात बदल गए। ईरान ने धीरे-धीरे उन सीमाओं को तोड़ना शुरू कर दिया, जो उसके न्यूक्लियर प्रोग्राम को कंट्रोल में रखती थीं, ईरान ने न्यूक्लियर पॉवर बनने की छह में धीरे-धीरे अपनी गतिविधियां बढ़ा दीं। अब जब ट्रंप दोबारा ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को काबू में लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें पहले से कहीं ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पुराने फैसले के असर आज साफ दिख रहे हैं, जिसने पूरे क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है।

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क्या थी डील?

दरअसल, साल 2015 में बराक ओबामा के दौर में यूएस और ईरान के बीच एक बड़ी न्यूक्लियर डील हुई थी, जिसका नाम था- ‘Joint Comprehensive Plan of Action’, इस समझौते के तहत ईरान ने अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम पर सख्त सीमाएं मान ली थीं। उसने करीब 97% यानी लगभग 12.5 टन यूरेनियम रूस भेज दिया और वादा किया कि 2030 तक वह अपने काम को तय दायरे में रखेगा। उस समय माना गया कि इससे ईरान के न्यूक्लियर हथियार बनाने का खतरा काफी हद तक कम हो गया है।

लेकिन सिर्फ तीन साल बाद, ट्रंप ने इस डील को एकतरफा बताते हुए अमेरिका को इससे बाहर कर लिया। उनके इस फैसले का असर जल्दी ही दिखने लगा। ईरान ने धीरे-धीरे उन सभी सीमाओं को तोड़ना शुरू कर दिया, जो पहले उसे रोकती थीं। उसने यूरेनियम को ज्यादा तेजी से एनरिच करना शुरू किया और अपना स्टॉक बढ़ा लिया।

आज हालात ये हैं कि जांच एजेंसियों के मुताबिक, ईरान के पास बड़ी मात्रा में ऐसा यूरेनियम है जो न्यूक्लियर हथियार बनाने के काफी करीब पहुंच चुका है। कुछ रिपोर्ट्स तो यह भी कहती हैं कि कुल मिलाकर उसके पास करीब 11 टन यूरेनियम है, जिसे अगर और प्रोसेस किया जाए तो कई न्यूक्लियर बम बनाए जा सकते हैं।

अब बातचीत सिर्फ न्यूक्लियर प्रोग्राम तक सीमित नहीं रही। इसमें मिसाइल सिस्टम, मिडिल ईस्ट का तनाव और होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) जैसे अहम मुद्दे भी जुड़ गए हैं। ट्रंप अब एक नई और बेहतर डील की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ईरान अब सुनने को तैयार नहीं!

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