मध्य-पूर्व में ईरान से युद्ध के दौरान अमेरिका और नाटो देशों के बीच दरार खुलकर सामने आ गई है। ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप नाटो से बाहर होने की बात कह रहे हैं। यदि ईरान जंग के बाद अमेरिका नाटो से बाहर होने का फैसला करता है तो वैश्विक स्तर पर क्या बदलेगा, पढ़ें पूरी खबर।
US-NATO Split: ईरान संघर्ष में नाटो सहयोगियों से अपेक्षित मदद न मिलने पर वाशिंगटन और ब्रुसेल्स के बीच दरार अब सार्वजनिक हो चुकी है। राष्ट्रपति ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के हालिया कड़े बयानों ने 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति को सैन्य स्तर पर भी लागू करने के संकेत दे दिए हैं। अमेरिका का नाटो से संभावित अलगाव केवल एक सैन्य फैसला नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के पुनर्गठन की शुरुआत होगी। ऐसे में वैश्विक स्तर पर क्या बदलाव आ सकते हैं? आइए विस्तार से समझते हैं।'
अमेरिका के नाटो से बाहर होने पर संगठन की ताकत में भारी गिरावट आएगी। 2025 की 'नाटो वार्षिक रिपोर्ट' के अनुसार, नाटो के कुल रक्षा खर्च का लगभग 60% अमेरिका देता है, जबकि सैन्य क्षमता में उसकी हिस्सेदारी 50% से अधिक है। परमाणु हथियारों में भी 70-80% नियंत्रण उसी के पास है। इसके अलावा, उन्नत एयरपावर, सैटेलाइट और साइबर तकनीक में अमेरिका अग्रणी है। दुनियाभर में उसके 750 से अधिक सैन्य ठिकाने नाटो अभियानों को मजबूती प्रदान करते हैं। ऐसे में अमेरिका के हटने से नाटो की आधे से अधिक शक्ति और प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।
अमेरिका के नाटो से बाहर होने पर चीन और रूस का प्रभाव बढ़ सकता है। अमेरिका नाटो की सबसे बड़ी सैन्य और रणनीतिक ताकत है; उसके हटते ही गठबंधन कमजोर हो जाएगा। इस स्थिति का फायदा उठाकर रूस यूरोप, खासकर पूर्वी यूरोप में अपना दबदबा बढ़ा सकता है। वहीं चीन वैश्विक स्तर पर अपनी राजनीतिक और आर्थिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगा। कमजोर नाटो के कारण पश्चिमी देशों की सामूहिक सुरक्षा घटेगी, जिससे शक्ति संतुलन बदलकर चीन और रूस के पक्ष में जा सकता है।
'नाटो वार्षिक रिपोर्ट' 2025 के अनुसार, नाटो के कुल रक्षा खर्च का लगभग 60% अमेरिका देता है। यदि अमेरिका इस महत्वपूर्ण सैन्य गठबंधन से हटता है, तो जर्मनी, फ्रांस, पोलैंड जैसे यूरोपीय देशों को अपनी सामाजिक योजनाओं का पैसा काटकर सेना पर खर्च करना पड़ सकता है। इससे नाटो देशों के सामने बजट की समस्या आएगी। साथ ही, अमेरिका की डॉलर वाली साख को भी झटका लग सकता है। अमेरिका की वैश्विक शक्ति उसके सैन्य गठबंधनों पर टिकी है। नाटो छोड़ने से डॉलर के प्रति दुनिया का भरोसा कम हो सकता है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। इसका कारण यह है कि दुनिया भर के देश डॉलर को सुरक्षित मानते हैं क्योंकि अमेरिका वैश्विक सुरक्षा का एक तरह से गारंटर है।
इस प्रकार, अमेरिका का नाटो छोड़ना केवल एक सैन्य फैसला नहीं होगा, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकती है। यूरोप को 'सामरिक स्वायत्तता' के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जबकि अमेरिका दुनिया में अपना नेतृत्व खो सकता है।
यदि अमेरिका नाटो से बाहर होता है, तो यह भारत के लिए रणनीतिक अवसर पैदा कर सकता है। अमेरिका का ध्यान यूरोप पर कम होगा, जिससे भारत अपनी सुरक्षा और कूटनीति में अधिक स्वतंत्रता पा सकता है। अमेरिका एशिया पर फोकस बढ़ा सकता है, जिससे भारत के साथ रक्षा, टेक्नोलॉजी और समुद्री सुरक्षा सहयोग मजबूत हो सकता है। कमजोर नाटो से भारत चीन और पाकिस्तान के साथ क्षेत्रीय संतुलन बनाने में लाभ उठा सकता है। इसके अलावा, वैश्विक मंचों पर भारत की भागीदारी और प्रभाव बढ़ सकता है। भारत यूरोपीय देशों और रूस के साथ स्वतंत्र रूप से रक्षा समझौते कर सकेगा, जिससे अमेरिकी दबाव कम होगा।