US Israel- Iran War: अमेरिका अपने 30 साल पुराने एक सफल ऑपरेशन को ईरान में दोहराने की कोशिश में है। क्या था अमेरिका ऑपरेशन प्रोजेक्ट सफायर...
US Israel- Iran War:अमेरिका-इजरायल और ईरान जंग को 1 महीना बीत गया है। दोनों ओर से भीषण हमले जारी हैं। इसी बीच अमेरिका के 10 हजार से अधिक मरीन कमांडो और सैनिक मध्य एशिया पहुंच चुके हैं। माना जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में अमेरिका जमीनी लड़ाई शुरू कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका, ईरान की परमाणु क्षमता को पूरी तरह से खत्म करने के लिए यह कदम उठा सकता है। ईरान के पास लगभग 440-450 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम है। यह मात्रा लगभग 10 परमाणु हथियार बनाने के लिए पर्याप्त है। ऐसे में अमेरिका इसे अपने कब्जे में लेने के लिए 30 साल पुराने सफल अभियान अब ईरान में दोहराने की तैयारी में है।
दरअसल, साल 1945 में वर्ल्ड वार 2 के बाद दुनिया दो ध्रुवों में बट चुकी थी। सोवियत संघ और अमेरिका का वैश्विक दुनिया पर प्रभाव था। दो महाशक्तियों के बीच कोल्ड वार भी शुरू हो गई थी, लेकिन साल 1990 आते आते सोवियत संघ विघटित होने के कगार पर आ गया। साल 1991 में सोवियत संघ विघटित होकर 15 राष्ट्रों में बद गया, लेकिन इस विघटन ने दुनिया के सामने परमाणु प्रसार का सबसे बड़ा खतरा पैदा कर दिया।
पूर्व सोवियत गणराज्यों में बिखरे परमाणु हथियार और उच्च संवर्धित यूरेनियम (HEU) को सुरक्षित करने के लिए अमेरिका ने कई गुप्त अभियान चलाए। इनमें सबसे चर्चित था प्रोजेक्ट सफायर, जो 1994 में कजाकिस्तान से 600 किलोग्राम हथियार-ग्रेड यूरेनियम को एयरलिफ्ट करने का ऑपरेशन था।
अक्टूबर 1994 में तीन C-5 गैलेक्सी कार्गो प्लेन डेलावेयर के डोवर एयर फोर्स बेस से रवाना हुए। 25 विशेषज्ञों की टीम ने चार हफ्ते तक 12-12 घंटे की शिफ्ट में काम किया। यूरेनियम को 400 सुरक्षित कंटेनरों में पैक किया गया। कजाकिस्तानी सेना और पुलिस की मदद से सामान को एयरपोर्ट पहुंचाया गया। नवंबर 1994 में पूरा स्टॉक टेनेसी के ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी में पहुंचा दिया गया। क्लिंटन ने 23 नवंबर 1994 को दुनिया को इसकी घोषणा की।
हालांकि, कजाकिस्तान में चलाए गए ऑपरेशन और ईरान में संभावित ऑपरेशन के बीच जमीन आसमान का फर्क है। कजाकिस्तान में चलाया गया ऑपरेशन शांतिपूर्ण था। यह नेचर नॉन कॉम्बैट था। जबकि, ईरान में संभावित ऑपरेशन उच्च जोखिम वाला है। इसमें अमेरिकी सैन्य बलों को ईरानी क्षेत्र में घुसना पड़ेगा। उन्हें न्यूक्लियर साइट्स को सुरक्षित करके मलबे से यूरेनियम निकालने पड़ेंगे। इस दौरान उन पर ईरानी सेना व IRGC के हमले का खतरा भी बना रहेगा।