
तो आंखों के बगैर कैसे लौटेगी नेत्रदिव्यांगों की रोशनी, आंखों को सुरक्षित रखने सम्भाग में नहीं आईबैंक
आंखों की रोशनी पाने कतार में खड़े तीन सैकड़ा लोग, दानदाता मात्र ६
जागरूकता और धार्मिक बाधाओं ने नेत्रदाताओं की बढ़ाई दूरी, शरीर के साथ खाक हो रही अनमोल दृष्टि
अनूपपुर। कहते हैं मानवीय जीवन में दुनिया की सबसे अनमोल चीजों में आंखें शामिल हैं, जो प्रकृति और जीवन की वास्तविकताओं से मानव को रूबरू कराते हुए जीवन को सतरंगी बनाती है। इसके अभाव में ब्रह्मांड की खूबसूरती और जीवन की खुशियां भी काला और शून्य नजर आता है। एक व्यक्ति द्वारा किए गए नेत्रदान से दो इंसानों को रोशनी प्रदान की जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि किसी व्यक्ति की मौत से ६ घंटे के भीतर संग्रह किया गया आंख दूसरे व्यक्ति को प्रत्यारोपित कर दी जाए। लेकिन अनूपपुर जिला सहित पूरे सम्भाग में किए गए नेत्रदान को संरक्षण के लिए कोई आईबैंक जैसी सुविधा नहीं है। यहीं कारण है कि आईबैंक के अभाव में डॉक्टरों द्वारा भी मौत के उपरांत आंखों को प्रीजर्व करने के प्रयास भी नहीं किए जाते। जबकि जिले में वर्तमान नेत्रदाताओं व नेत्रग्रहणकर्ताओं के आंकड़ों में चंद ही लोग इस अनमोल चीज को दुबारा धारण का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं। शेष इंतजारों की धडिय़ा गिन-गिनकर दुनिया से अलविदा कह जाते हैं। ऐसा नहीं है कि जिले में नेत्रदाताओं की कमी है और नेत्रग्रहण करने वाले लोगों की तादाद अधिक है। लेकिन नेत्रदान नहीं होने में आमलोगों तक आंखें की महत्ता की जानकारी का अभाव और धार्मिक विचारों में बंटी लोगों की सोच भी मुख्य कारण है, जो मौत के आगोश में समा रही नश्वर शरीर के साथ आंख जैसी अनमोल चीज को भी रस्मों के साथ दफन कर देने से नहीं चूकते है। वहीं कुछ समुदाय धार्मिक विचारों के कारण आंखें दान करने से परहेज कर जाते हैं।
नेत्र विशेषज्ञ डॉ. जनक सारीवान का कहना है कि कोर्नियाब्लाइंडनेस(नेत्रदिव्यांग) पीडि़त लगभग ३०० से अधिक लोग आंखों के लिए कतार में रजिस्टर्ड खड़े हैं। लेकिन अबतक ऐसे नेत्रदान के लिए मात्र ६ लोगों ने अपना आवेदन दिया है। जबकि आंकड़ों के अनुसार देखा जाए तो अनूपपुर जिले में सडक़ हादसों से लेकर अन्य बीमारियों से पीडि़त प्रतिवर्ष लगभग ४५०-५०० लोगों की मौत होती है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी इतने ही तादाद में लोगों की स्वाभाविक और बीमारियों के दौरान मौतों का शिकार बनते हैं। बावजूद हम ३०० नेत्र के लिए कतार में खड़े लोगों को आंखे नहीं लगा पा रहे हैं। अगर जागरूकता के माध्यम से नेत्रदान के लिए पे्ररित कराया जाए तो सम्भव है कि जिले में आंखों के लिए एक भी व्यक्ति को तरसना नहीं पड़े। क्योंकि बचपन से ही खो चुकी आंखों की रोशनी या बाद में चोट व दुर्घटनाओं के शिकार में नेत्रदिव्यांग बने लोगों के लिए नेत्रदाताओं की आंख ही एक मात्र सहारा बनती है।
बॉक्स: बिना आईबैंक कहां रखे सुरक्षित आंखें
शहडोल सम्भाग में आईबैंक जैसी कोई सुविधा नहीं है। रीवा जिले में आईबैंक की व्यवस्था है। लेकिन नेत्रदाता की मौत की सूूचना पर डॉक्टरों की टीम का ६ घंटे के भीतर पहुंचना असम्भव सा दिखता है। नेत्र विशेषज्ञ का कहना है कि अगर उनके द्वारा आंखों को निकाला भी जाए तो अस्पतालों में उसे सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी नहीं है। माना जाता है कि जल्द ही शहडोल सम्भाग में आईबैंक स्थापित कराने नेत्र विशेषज्ञों की टीम द्वारा जिलों का सर्वे कराया जा रहा है, जिसपर प्रस्ताव बनाकर शासन से मांग की जा सके।
------------
बॉक्स: क्या है कार्नियलब्लंाइडनेस
नेत्र विशेषज्ञ की राय के अनुसार कार्नियलब्लंाइडनेस दो प्रकार से होती है। एक तो बचपन से ही या भी दूसरी चोट के कारण। इनमें लकवा, कुपोषण से प्रभावित लोगों में भी कार्नियालब्लंाइडनेस के मामले आते हैं। लेकिन इनकी तादाद नामात्र होती है। कार्नियलब्लंाइडनेस का मुख्य कारण आंखों में चोट लगना, चोट के उपरांत बिना डॉक्टर सलाह दवाई का उपयोग करना, पैदाईशी बीमारी होना शामिल हैं। जिसमें पुतली सहित पुतली के आसपास सफेद दाग बन जाता है, और उपचार के अभाव में यह कार्नियलब्लंाइडनेस का स्वरूप ले लेता है।
-----------
बॉक्स: ८६ वर्षीय समाजसेवी ने नेत्रदान की थी पहल
अनूपपुर नगरीय क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस कार्यकर्ता तथा नगर के समाजसेवी ८६ वर्षीय समाजसेवी शंकर प्रसाद शर्मा ने सर्वप्रथम अपनी आंखें दान करने जिला अस्पताल में स्वेच्छा से आवेदन दिया था। जिनकी पहल के बाद नगर के अन्य पांच लोगों ने भी अपना नेत्रदान के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। इनमें नेत्रविभाग में कार्यरत कर्मचारी ने भी नेत्रदान का आवेदन कर अन्य के जीवन में रोशनी भरने की जिम्मेदारी उठाई है।
----------------------------------------------------
Published on:
10 Jun 2018 07:59 pm

बड़ी खबरें
View Allअनूपपुर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
