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Mere Ram: एक ऐसा मंदिर जिसमें राम नहीं, सिर्फ सीता की होती है पूजा, यही हुआ था लवकुश का जन्म

patrika.com पर 'मेरे राम' सीरिज में हम आपको बता रहे हैं भगवान राम से जुड़े स्थलों के बारे में, जो आज तीर्थ बनकर पूजे जाते हैं। उन्हीं में से है वाल्मीकी आश्रम, जहां लवकुश का जन्म हुआ था।

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मान्यता है कि अशोक नगर जिले में वाल्मीकि आश्रम था और यहीं पर लव-कुश का जन्म हुआ था।

भगवान श्रीराम हर व्यक्ति के प्राणों में बसते हैं। अपने वनवास के दौरान भगवान श्रीराम जहां-जहां भी गए वो स्थान आज तीर्थ माने जाते हैं। भगवान से जुड़े हर प्रसंग का अपना महत्व है। उन्हीं में से एक है वाल्मीकि आश्रम और लवकुश का जन्म स्थान। क्या आप जानते हैं वाल्मीकी आश्रम कहा है और कहां लवकुश का जन्म हुआ था।


patrika.com पर 'मेरे राम' सीरिज में हम आपको बता रहे हैं भगवान राम से जुड़े स्थलों के बारे में, जो आज तीर्थ बनकर पूजे जाते हैं। उन्हीं में से है वाल्मीकी आश्रम, जहां लवकुश का जन्म हुआ था।

प्राचीन मान्यता है कि जब सीतामाता अयोध्या छोड़कर वाल्मीकी आश्रम में आ गई थीं और उन्होंने इसी आश्रम में अपने जुड़वा बेटों लव और कुश को जन्म दिया था। वाल्मीकी का यह आश्रम और लवकुश का जन्म स्थल मध्यप्रदेश में ही माना जाता है। अशोकनगर जिले में यह स्थान है। यहीं पर स्थित करीला पहाड़ी पर यह स्थान माना जाता है और यहां स्थित जानकी मंदिर में सीता माता विराजमान है। सीता का यह इकलौता मंदिर है, जहां वे राम के बगैर विराजमान है। इसी मंदिर के करीब ही वाल्मीकी आश्रम भी है, जहां एक गुफा है, जिसे दर्शन के लिए खोला जाता है।


वाल्मीकि के जिस आश्रम में माता जानकी ने पुत्रों को जन्म दिया था वो आश्रम मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले की तहसील मुंगावली में माना जाता है। हालांकि इसके अलावा भी कुछ लोग अपने-अपने राज्यों में आश्रम होने का दावा करते हैं। मुंगावली के करीला पहाड़ी पर इसी स्थान को लवकुश का जन्म स्थान माना गया है। यह पूरा क्षेत्र वाल्मीकी आश्रम भी माना जाता है। इसलिए यह स्थान पूज्यनीय हो गया है। सदियों से यहां के माता जानकी मंदिर में हर वर्ष मेला लगता है और निःसंतान दंपती यहां आराधना के लिए आते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां मन्नत मांगने से निसंतान दंपती को संतान की प्राप्ति होती है।

लव-कुश के जन्म पर अप्सराएं भी उतर आई थीं

यहां के पुजारी बताते हैं कि लव और कुश का जन्म करीला में स्थित वाल्मीकि आश्रम में हुआ था। दोनों के जन्म के बाद मां जानकी के अनुरोध पर महर्षि वाल्मीकि ने उनका जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया था। इस दौरान स्वर्ग से उतरकर अप्सराएं तक पृथ्वी पर आ गई थीं और उन्होंने खुशी में नृत्य किया था। अप्सराओं ने बधाई गीत भी गाए थे। तभी से एक प्रथा आज भी निभाई जाती है। यहां हर वर्ष रंगपंचमी पर लव-कुश का जन्म दिन मनाया जाता है। उसी दिन यहां बड़ा मेला भी लगता है। इसी मेले में आकर कई लोग नृत्यांगनाओं से नृत्य करवाते हैं। ऐसी माना जाता है कि जिसकी मनोकामना पूरी हो जाती है, वो यहां नृत्य करवाता है, या नृत्य करवाने वाले की मनोकामना यहां पूरी हो जाती है। नृत्य के साथ बधाई गीत गाए जाते हैं। सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि यहां जो कामना की जाती है, वो पूरी हो जाती है। मनोकामना पूरी हो जाने के बाद नृत्य करवाने की परंपरा है।

तपस्वी महाराज को आया था स्वप्न

मंदिर के पुजारी कहते हैं कि इस जगह के बारे में स्थानीय लोगों के बीच एक कथा भी प्रचलित है। आज से लगभग 200 सालों से भी अधिक समय पहले विदिशा जिले के ग्राम दीपनाखेड़ा के महंत तपस्वी महाराज को रात में स्वप्न आया था कि करीला ग्राम में टीले पर स्थित आश्रम में मां जानकी और लव-कुश कुछ समय तक रहे थे। यह वाल्मीकि आश्रम वीरान पड़ा हुआ है, वहां जाकर आश्रम को जागृत करो। अगले ही दिन सुबह तपस्वी महाराज करीला पहाड़ी को ढूंढने निकल पड़े और जैसा कि स्वप्न में दिख रहा था, बिल्कुल ही वैसा ही नजारा उन्हें दिन में दिखाई दिया। यह देख तपस्वी महाराज हैरान हो गए। श्रद्धा-भाव से महाराजजी पहाड़ी पर रुक गए और खुद ही आश्रम की साफ-सफाई करवाई और उसे पवित्र करने जुट गए। देखते ही देखते आश्रम की रौनक लौट आई।

यह भी है किंवदंती

एक किंवदंती यह भी है कि इस आश्रम का वातावरण पहले ऐसा था, कि यहां शेर और गाय साथ-साथ रहा करते थे। यहां तक कि आश्रम के काम में भी पशु मदद करते थे, जिसमें बंदर प्रमुख थे। करीला स्थित मां जानकी मंदिर की भभूति को आसपास के किसान फसलों में कीटाणु नाशक और इल्लीनाशक के रूप में भी उपयोग करते हैं। माना जाता है कि इससे फसल से इल्लियां गायब हो जाती हैं।

160 किमी दूर है करीला

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से यह स्थान 160 किलोमीटर दूर है। देश-विदेश से इस स्थान पर जाने वाले पहले भोपाल एयरपोर्ट पर आ सकते हैं। यहां से सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। इसके लिए भोपाल से बैरसिया रोड होते हुए विदिशा जिले के सिरोंज होते हुए अशोक नगर जिले के मुंगावली पहुंचते हैं, वहां से करीला पहाड़ी पर यह स्थान है। नजदीकी रेलवे स्टेशन ललितपुर है, जहां से 100 किलोमीटर दूर है करीला।

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