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राहु को ज्योतिष के 9 ग्रहों में एक छाया ग्रह माना जाता है। इसे दैत्य ग्रह के साथ ही ज्योतिष शास्त्र में दुख का कारक भी माना गया है। वहीं इसे अशुभ ग्रह माना जाता है। कुंडली में राहु के अशुभ भाव में होने पर जहां तमाम तरह की परेशानियां आती हैं तो वहीं शुभ स्थिति में होने पर राहु व्यक्ति का भाग्य तक बदलने की क्षमता रखता है, यानि गजब का लाभ प्रदान करता है। यहां ये भी बता दें कि राहु एकमात्र ऐसा ग्रह है जो मंगल के साथ बैठने पर मंगल असर तक शून्य कर देता है, जबकि इस स्थिति में राहु भी निष्क्रिय हो जाता है।
सामान्यत: लोग कुंडली में राहु की दशा लगने से अत्यंत डरते हैं। कारण जब राहु की महादशा आती है तो इंसान में नकारात्मकता आने लगती है। कई बार अत्यधिक तनाव महसूस होने लगता है। असल में कुंडली में चौथा घर मानसिक शांति का घर होता है। यदि राहु कुंडली के चौथे घर में होता है, तो अवसाद और नकारात्मकता की समस्या बढ़ने लगती है। ऐसे में व्यक्ति को बार-बार लगता है कि उसे किसी प्रकार की बीमारी हो गई है। साथ ही राहु की दशा होने पर चीजों के प्रति फोबिया भी हो जाता है।
वहीं दूसरी ओर जब शनि एवं राहु कुंडली में एक साथ मिलते हैं, तो कई बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। परंतु राहु केवल नकारात्मकता का योग ही नहीं बनाता है। यदि राहु अच्छी स्थिति में है तो व्यक्ति के जीवन में बेहतरीन योग बनते हैं। राहु कुंडली में प्रत्येक 18 महीने के बाद तीसरे घर में प्रवेश करता है। जब ऐसा होता है तो लाभ की संभावना बढ़ जाती है। राहु की महादशा में होने वाली समस्या से बचने के लिए स्वयं पर पूर्ण नियंत्रण रखें।
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राहु ग्रह का महत्व
ज्योतिष में राहु ग्रह को एक पापी ग्रह माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में राहु ग्रह को कठोर वाणी, जुआ, यात्राएं, चोरी, दुष्ट कर्म, त्वचा के रोग, धार्मिक यात्राएं आदि का कारक कहते हैं। जिस व्यक्ति की जन्म पत्रिका में राहु अशुभ स्थान पर बैठा हो, अथवा पीड़ित हो तो यह जातक को इसके नकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं। ज्योतिष में राहु ग्रह को किसी भी राशि का स्वामित्व प्राप्त नहीं है। लेकिन मिथुन राशि में यह उच्च होता है और धनु राशि में यह नीच भाव में होता है।
वैदिक ज्योतिष में राहु ग्रह को कठोर वाणी, जुआ, यात्राएं, चोरी, दुष्ट कर्म, त्वचा के रोग, धार्मिक यात्राएँ आदि का कारक कहते हैं।जिस व्यक्ति की जन्म पत्रिका में राहु अशुभ स्थान पर बैठा हो, अथवा पीड़ित हो तो यह जातक को इसके नकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं। ज्योतिष में राहु ग्रह को किसी भी राशि का स्वामित्व प्राप्त नहीं है। लेकिन मिथुन राशि में यह उच्च होता है और धनु राशि में यह नीच भाव में होता है।
27 नक्षत्रों में राहु आद्रा, स्वाति और शतभिषा नक्षत्रों का स्वामी है। ज्योतिष में राहु ग्रह को एक छाया ग्रह कहा जाता है। राहु का रत्न गोमेद है, लेकिन इसे कभी भी किसी जानकार की सलाह के बिना धारण नहीं करना चाहिए।
Published on:
28 Sept 2023 04:15 pm
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