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Garuda Purana: क्या बेटी कर सकती है अंतिम संस्कार? जानिए मुखाग्नि और पिंडदान पर धारणा और सच्चाई

Garud Puran Niyam: आज के समय में यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या बेटी अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार, मुखाग्नि और पिंडदान कर सकती है। गरुड़ पुराण और शास्त्रों की व्याख्या के अनुसार इस विषय में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं।

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भारत

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MEGHA ROY

May 06, 2026

Garud Puran

Last Rites in Hinduism Garud Puran|Chatgpt

Garuda Purana Niyam: सनातन धर्म में अंतिम संस्कार को अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र कर्तव्य माना गया है, जो आत्मा की शांति और आगे की यात्रा से जुड़ा होता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि यह जिम्मेदारी पुत्र को दी जाती है। लेकिन बदलते समय और परिस्थितियों में यह सवाल भी उठता है कि क्या बेटी यह कर्तव्य निभा सकती है। गरुड़ पुराण में इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं। इन्हीं नियमों और मान्यताओं को समझना आज के समय में जरूरी हो जाता है।

अंतिम संस्कार का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आत्मा की आगे की यात्रा से जुड़ा हुआ चरण है। मान्यता है कि सही विधि-विधान से किए गए दाह संस्कार, पिंडदान और तर्पण से आत्मा को शांति मिलती है और वह अपने अगले लोक की ओर प्रस्थान करती है। इसलिए इसे पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ करने का विशेष महत्व बताया गया है।

क्या बेटी दे सकती है मुखाग्नि?

ज्योतिषी प्रमोद शर्मा के अनुसार आज के समय में यह सवाल उठता है कि क्या बेटी अपने माता-पिता की मुखाग्नि दे सकती है। शास्त्रों में कहीं भी स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया है कि बेटी यह कार्य नहीं कर सकती। यदि परिवार में पुत्र नहीं है, तो ऐसी स्थिति में पुत्री को भी यह अधिकार दिया जा सकता है। विषम परिस्थितियों में बेटी द्वारा अंतिम संस्कार करना पूरी तरह संभव और सम्मानजनक माना जाता है।

क्या गरुड़ पुराण में सिर्फ पुत्र का अधिकार है?

अक्सर यह माना जाता है कि अंतिम संस्कार और मुखाग्नि का अधिकार केवल पुत्र को ही होता है, लेकिन गरुड़ पुराण में ऐसा कठोर नियम नहीं दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार यदि पुत्र उपलब्ध न हो, तो परिवार का कोई भी योग्य सदस्य यह दायित्व निभा सकता है। इसमें पौत्र, प्रपौत्र, भाई या भतीजा भी शामिल हैं। मूल भावना यह है कि संस्कार बिना रुके पूरी श्रद्धा से संपन्न हो।

पत्नी और अन्य रिश्तेदारों की भूमिका

यदि मृतक के परिवार में पुत्र न हो, तो पत्नी भी मुखाग्नि और श्राद्ध कर्म कर सकती है। इसके अलावा भाई, भतीजे या अन्य निकट संबंधी भी यह जिम्मेदारी निभा सकते हैं। विशेष परिस्थितियों में शिष्य या करीबी मित्र को भी यह अधिकार दिया गया है।

पिंडदान और तर्पण का महत्व

अंतिम संस्कार के बाद पिंडदान और तर्पण करना आत्मा की शांति के लिए अत्यंत आवश्यक माना गया है। यह माना जाता है कि इससे आत्मा को मोक्ष की दिशा मिलती है और वह पितृ लोक में स्थान प्राप्त करती है।