शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी में जनेऊ को छोड़कर समस्त शुभ व मांगलिक कार्य यथा- विवाह, देव-प्रतिष्ठा, पौष्टिक, वास्तु-गृहारम्भ व गृह-प्रवेश, यात्रा व अन्य मांगलिक कार्यादि करने योग्य हैं, पर चतुर्दशी तिथि में समस्त शुभ व मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
त्रयोदशी तिथि में जन्मा जातक सामान्यत: धनवान, विद्यावान, पराक्रमी, परोपकारी, बुद्धिमान, योग्य, शास्त्र का ज्ञाता तथा राज समाज में मान-सम्मान पाने वाला होता है।
आर्द्रा नक्षत्र में असद् कार्य सिद्ध होते हैं और विद्यादि कार्य शुभ माने गए हैं। पुनर्वसु नक्षत्र में तिथि आदि शुभ हो तो शांति, पुष्टता, यात्रा, अलंकार, घर, सवारी, वाहन क्रय करना, व्रतादि रखना, कृषि व विद्यादि कार्य करने चाहिए।
आर्द्रा नक्षत्र में जन्मा जातक नम्र स्वभाव, साहसी, बुद्धिमान, थोड़ा आडम्बरी, अल्प शिक्षित, क्षुद्र व ओछे विचार वाला तथा विचलित, मन-मस्तिष्क वाला होता है। इनका भाग्योदय लगभग 25 वर्ष की आयु के बाद होता है।
वारकृत्य कार्य
शुक्रवार को सामान्यत: गुप्तवार्ता, छायाचित्र, फिल्मकार्य, नाटक, संगीत सीखना, शैया, मणिरत्न, सुगंध, वस्त्र, उत्सव, आभूषण, भूमि व्यापार, गौ संबंधी, कृषि कर्म, जमीन, जायदाद व भण्डार (संग्रह) से संबंधित कार्य शुभ कहे गए हैं।
दिशाशूल
शुक्रवार को पश्चिम दिशा की यात्रा में दिशाशूल रहता है। अतिआवश्यकता में कुछ जौ के दाने चबाकर शूल की दिशा की अनिवार्य यात्रा पर प्रस्थान कर लेना चाहिए। वैसे भी शुक्रवार को मिथुन राशि के चंद्रमा का वास उत्तर दिशा की यात्रा में सम्मुख रहने से लाभप्रद व शुभप्रद रहेगी।