Gayatri Jayanti 2021: गायत्री जयंती कब है? जानें पूजा विधि और मंत्र, साथ ही इसकी खासियत

मां गायत्री को वेदमाता के रूप में भी जाना जाता है...

गायत्री की महिमा के पवित्र वर्णन शास्त्रों में अनेक जगह मिलते हैं। वहीं वेदों में मां गायत्री को वेदमाता Vedmata Gayatri , देवमाता और विश्वमाता माना गया है। गायत्री मंत्र त्रिदेव बृह्मा, विष्णु और महेश का सार है। ये भारतीय संस्कृति की जन्मदात्री भी मानी जाती हैं।

सभी ऋषि-मुनि भी गायत्री का गुण-गान करते हैं। Goddess Gayatri पंचमुखों वाली भी बताई गईं हैं, इसके संबंध में बताया जाता है कि यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड- जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश के पांच तत्वों से बना है।

ऐसे में इस साल यानि 2021 में गायत्री प्रकटोत्सव (Gayatri Jayanti) 20 जून को मनाया जाएगा। वहीं कुछ जगह उदया तिथि के चलते इसे 21 जून को भी मनाएंगे।

गायत्री जयंती पूजा का समय...
एकादशी तिथि शुरु : 20 जून 2021 : शाम 04:22 से
एकादशी तिथि का समापन : 21 जून 2021 : दोपहर 01:32 तक

वैसे गायत्री जयंती की तिथि को लेकर अनेक मत हैं। एक ओर जहां कुछ स्थानों पर गायत्री जयंती की तिथि और गंगा दशहरा एक समान बताई जाती है तो कुछ इसे गंगा दशहरा से अगले दिन यानि ज्येष्ठ मास की एकादशी को मनाते हैं। वहीं श्रावण पूर्णिमा को भी गायत्री जयंती के उत्सव को मनाया जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी-एकादशी को भी मान्यतानुसार गायत्री जयंती मनाई जाती है।

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समस्त सनातन धर्म ग्रंथों में गायत्री की महिमा ( gayatri jayanti significance ) एक स्वर से कही गई। Sanatan Dharma में गायत्री मंत्र को अत्यंत सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस मंत्र का जहां हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले हमेशा जाप करते हैं, वहीं कई शोधों में तक इस बात को माना गया है कि गायत्री मंत्र के जाप के कई फायदे हैं।

गायत्री मंत्र : - ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।।

गायत्री मंत्र को गुरू मंत्र भी माना जाता है, ऐसे में बिना गुरु के साधना का फल देरी से मिलने की बात कही जाती हैं। ऐसे में साधक अपने गुरु की चेतना का आवाहन, उपासना की सफलता पूजा स्थल पर इस मंत्र से करें-
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुर्रु देवों महेश्वरः।
गुर्रु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।

आवाहन के बाद देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने के लिए पंचोपचार द्वारा पूजन विधिवत् संपन्न करें-
- जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य आदि पांच पदार्थ प्रतीक के रूप में मां के समक्ष अर्पित करें ।

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शांत चित्त बैठकर जाप करें-
गायत्री मंत्र का जाप शांत चित्त बैठकर किया जाना चाहिए। माना जाता है कि जाप करते समय बंद नेत्रों से उगते हुए Surya का ध्यान करने से मंत्र जप का फल अधिक मिलता हैं। जाप प्रक्रिया कषाय ( भेद- क्रोध, मान, माया तथा लोभ) -कल्मषों-कुसंस्कारों को ह्दय से हटाने की भावना के साथ ही भौतिक सुख सुविधाओं की कामना के लिए की जाती है।

गायत्री मंत्र का जाप कम से कम तीन माला यानि घड़ी से प्रायः चौबीस मिनट या 11 माला अवश्य करना चाहिए। ध्यान रहें जाप के दौरान वक्त होठ हिलते रहने चाहिए, लेकिन आवाज इतनी हल्की होनी चाहिए कि पास बैठा व्यक्ति भी सुन न सकें।


गायत्री मंत्र: ये है खासियत...
1. सनातन धर्म में वेदों की संख्या चार है, साथ ही सभी चारों वेदों में गायत्री मंत्र का उल्लेख है। इस मंत्र के ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सवित्री हैं।

2. मान्यता के अनुसार इस मंत्र का नियमित तीन बार जाप करने वाले व्यक्ति के आस-पास तक नकारात्मक शक्तियां नहीं फटकती।

3. गायत्री मंत्र का जाप कई लाभ प्रदान करता है। मंत्र के अनुसार 'उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।'

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4. बौद्धिक क्षमता के साथ ही इस मंत्र के जाप से मेधा शक्ति यानि स्मरण की क्षमता में भी बढ़ौतरी होती है। जो व्यक्ति का तेज बढ़ाने के साथ ही दुःखों से छूटकारा दिलाने में भी मदद करती है।

5. गायत्री मंत्र का जाप सूर्योदय के दो घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त से एक घंटे बाद तक किया जा सकता है।

6. मौन मानसिक जाप किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन रात्रि में इस मंत्र का जाप नहीं करना चाहिए।

7. मान्यता है कि गायत्री मंत्र का जाप रात में लाभकारी नहीं होता है। यह इस समय कोई गलत परिणाम भी दे सकता है।

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8. गायत्री मंत्र 24 अक्षरों से बना है। चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक यह चौबीस अक्षर ही हैं। इसी कारण ऋषियों ने गायत्री मंत्र को भौतिक जगत में सभी प्रकार की मनोकामना को पूर्ण करने वाला बताया है।

9. गायत्री मंत्र के साथ श्रीं का संपुट लगाकर जाप करने से आर्थिक बाधा दूर होती है।

10. छात्रों के लिए यह मंत्र बहुत ही फायदेमंद मानते हुए स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है, इसलिए इसे मंत्रों का मुकुटमणि कहा गया है।

11. नियमित रूप से 108 बार गायत्री मंत्र का जाप करने से बुद्धि तेज और याददाश्त की क्षमता बढ़ जाती है। यह मंत्र व्यक्ति की बुद्धि और विवेक को निखारने का भी काम करता है।

वेदों के अनुसार मां गायत्री की पूजा उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है और हर स्थिति में यह लाभदायी है, लेकिन विधिपूर्वक श्रद्धा भावना के साथ की गयी उपासना अति फलदायी मानी गयी है । ब्रह्ममुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर गायत्री मंदिर या घर के किसी भी शुद्ध पवित्र स्थान पर पीले कुशा के आसन पर सुखासन में बैठकर गायत्री मां की पूजा की जानी चाहिए-

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गायत्री उपासना का विधि-विधान-

ब्रह्म संध्या - यह शरीर व मन को पवित्र व शुद्ध बनाने के लिए की जाती है। इसके तहत पांच तरह के कृत्य करने होते हैं ।

1. पवित्रीकरण - बाएं हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढंक लें और मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर और शरीर पर पवित्रता के भाव से छिड़क लें ।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोऽपि वा ।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।

2. आचमन - वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें। हर मंत्र के साथ एक-एक आचमन करें ।
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ।
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ।


3. शिखा स्पर्श और वंदन - शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए महसूस करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहां स्थापित रहेंगे। मंत्र का उच्चारण करें-
ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे ॥

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4. प्राणायाम - श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है। श्वास खींचने के साथ महसूस करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, वहीं छोड़ते समय यह महसूस करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियां, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। प्राणायाम इस मंत्र के उच्चारण के साथ करें ।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ।

5. न्यास - यह इसलिए किया जाता है ताकि शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश कर अंतः की चेतना को जगा सके ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । इसके तहत बाएं हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पांचों उँगलियों को जल में भिगोकर बताए गए स्थान को हर मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।
ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु । (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु । (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु । (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु । (समस्त शरीर पर)

इन पाचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता और प्रखरता की अभिवृद्धि हो साथ ही मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो। क्योंकि पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं ।

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मां गायत्री का ऐसे करें आवाहन
अगर घर में पूजा कर हैं तो महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा गायत्री का प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा वेदी पर स्थापित करें, वेदी पर कलश, घी का दीपक भी स्थापित करें । अब मंत्र के माध्यम से माता का आवाहन करें। साथ ही कामना करें कि आपकी प्रार्थना, श्रद्धा के अनुरूप मां गायत्री की शक्ति पूजा स्थल पर अवतरित हो रही है ।

मंत्र : ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि।
गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥
ॐ श्री गायत्र्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि,
ततो नमस्कारं करोमि।

आवाहन के बाद देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने के लिए पंचोपचार द्वारा पूजन विधिवत् संपन्न करें-
- जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य आदि पांच पदार्थ प्रतीक के रूप में माँ के समक्ष अर्पित करें ।

इसके बाद शांत चित्त बैठकर गायत्री मंत्र का जाप करें। यह जाप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः 24 मिनट या 11 माला अवश्य करें। यह जाप बेहद हल्की आवाज में करें साथ ही इस समय होंठ हिलते रहें।

गायत्री मंत्र : ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

मान्यता है क जाप पूरा होने के बाद शुद्ध हवन सामग्री या गाय के घी से गायत्री मंत्र की 24 या 108 आहुति का यज्ञ करने से हर प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ।

दीपेश तिवारी
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