
UP Municipal Election 2017
रण विजय सिंह
आजमगढ. निकाय चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। वार्डों के आरक्षण की सूची जारी की जा रही है। राजनीतिक दल और संभावित उम्मीदवार चुनाव तैयारियों लगे हैं। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए इसे सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा है। खासतौर पर भाजपा के लिए। कारण कि हाल में हुए विधानसभा चुनाव में उसे प्रचंड बहुमत मिला है और जीएसटी और मंहगाई के मुद्दे पर केंद्र सरकार बुरी तरह घिरी हुई है। अगर भाजपा यह चुनाव हारती है तो विपक्ष को हाबी होने का मौका मिलेगा। ऐसे में विपक्ष पूरी तरह से घेरेबंदी की तैयारी कर रहा है। विधानसभा में करारी हार के बाद सपा और बसपा खुद को साबित करने को बेचैन है। अगर वे बीजेपी को हराते है तो चुनाव से पहले उनके लिए यह संजीवनी से कम नहीं होगा। यही वजह है कि सभी की नजर इस चुनाव पर है और आम आदमी इसे लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल मान रहा है।
कहते हैं कि देश के सत्ता की सीढ़ी यूपी से होकर जाती है। कारण कि यहां लोकसभा की 80 सीटें हैं। सपा, बसपा और कांग्रेस के लिए पिछले दो चुनाव का अनुभव काफी कटु रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यूपी में मोदी लहर के चलते एकतरफा जीत हासिल करते हुए 73 सीटों पर कब्जा किया था। इसमें 71 सीट बीजेपी और दो सीट गठबंधन दलों की थी। सपा को पांच और कांग्रेस को दो सीट मिली थी लेकिन मुलायम सिंह यादव और गांधी परिवार के अलावा इन दलों का कोई प्रत्याशी नहीं जीता था।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी पुराना प्रदर्शन दोहराने में सफल रही। वर्ष 1991 में राम लहर होने के बाद भी पार्टी ने बड़ी मुश्किल से बहुमत हासिल किया था लेकिन इस बार 403 में से 325 सीट जीतने में सफल रही। न तो सपा-कांग्रेस का गठबंधन कोई करिश्मा कर सका और ना ही बसपा और उलेमा कौंसिल की गठजोड़ ही बीजेपी को रोकने के काम आई।
अब 2019 में बिहार की तर्ज पर यूपी में महागठबंधन की बात चल रही है लेकिन यह मूर्त रूप नहीं दिख रहा है। कारण कि राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षा भारी दिख रही है। राजनीतिक दल यूपी में गोरखपुर और इलाहाबाद की फूलपुर पर सीट पर होने वाले उपचुनाव में एकजुट होकर बीजेपी को मात देने की रणनीति बना रहे है लेकिन इस चुनाव में अभी समय है। आयोग गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ यहां चुनाव कराने का मन बना रहा है।
इससे पहले यूपी में निकाय चुनाव होने जा रहा है। बीजेपी हमेसा से नगरीय क्षेत्र में मजबूत रही है और हमेशा से सपा, बसपा और कांग्रेस पर भारी पड़ती रही है। पिछले दिनो नोटबंदी और हाल में लागू हुई जीएसटी के बाद भाजपा का वोट बैंक कहे जाने वाला व्यवसायी वर्ग कहीं न कहीं नाराज है। विपक्ष निकाय चुनाव में इसका फायदा उठाकर बीजेपी को मात देने की फिराक में है। साथ ही वह यह भी बताना चाहात है कि उसका जनाधार बढ़ा है और बीजेपी बैकफुट पर है।
यहीं वजह है कि पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने निकाय चुनाव पार्टी के सिंबल पर लड़ने का मन बनाया है। वहीं भाजपा भी अपनी ताकत देखना चाहती है। इसलिए यह दल भी कुछ इस तरह का फैसला ले सकता है। रहा सवाल बसपा और कांग्रेस का तो इनकी तरफ से अभी चुप्पी है। कांग्रेस के पास कुछ खास विकल्प भी नहीं दिख रहा है और ना ही इस दल से टिकट के लिए मारामारी है। अंदरखाने की खबरों पर विश्वास करें तो कांग्रेस के लोग इस चुनाव में भी सपा से गठबंधन चाहते हैं। बसपा हमेशा से ऐसे चुनाव से खुद को दूर बताती रही है लेकिन उसके प्रत्याशी भी मैदान में उतरते रहे हैं। इसबार पार्टी क्या करेगी अभी कह पाना संभव नहीं है। अगर बसपा भी सिबंल पर चुनाव लड़ती है तो लड़ाई दिलचस्प होगी। रहा सवाल राजनीति के जानकारों और मतदाताओं का तो वे इसे लोकसभा के सेमीफाइनल के रूप में देख रहे है। इनका मानना है कि चुनाव में जीत हासिल करने वाले का दावा लोकसभा में मजबूत होगा।
Published on:
09 Oct 2017 04:45 pm
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