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आजमगढ़ का यह स्‍कूल सरकारी योजनाओं से है महरूम, खुले मैं शौच के लिए मजबूर है छात्राएं और महिला शिक्षक

पांच साल से रसोईयों को नहीं मिला है गैस सिलेंडर, चुल्‍हें पर बनाती है भोजन, विकलांग बच्‍चों के लिए नहीं रैंप और ना ही चहारदिवारी

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Pre secondary school Sehda Azamgarh

आजमगढ़ का यह स्‍कूल सरकारी योजनाओं से है महरूम, खुले मैं शौच के लिए मजबूर है छात्राएं और महिला शिक्षक

रण विजय सिंह

आजमगढ़. केंद्र की मोदी और प्रदेश की योगी सरकार स्‍वच्‍छता और खुले में शौच से मुक्ति के लिए लगातार प्रयासरत है। इन योजनाओं पर करोड़ों रूपये खर्च भी किये जा रहे हैं। यहीं नहीं उज्‍ज्‍वला पीएम मोदी की महत्‍वाकांक्षी योजना है। खुद पीएम यह बात कई बार कह चुके है कि वे माताओं और बहनों को धुंआ से मुक्ति दिलाना चाहते है। इसके लिए हर घर तक गैस कनेक्‍शन पहुंचाया जा रहा है। लेकिन मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ में शहर से बामुश्किल आठ किमी दूरी पर स्थित परिषदीय जूनियर हाईस्‍कूल में रसोइयां पिछले पांच साल से मिड-डे-मील का भोजन बनाने के लिए चुल्‍हा फूंक रही हैं लेकिन उनका दर्द समझने के लिए कोई तैयार नहीं है। यही नहीं इस स्‍कूल में न तो विकलांगों के लिए रैंप है और ना ही शौचालय। ऐसा नहीं है कि स्कूल में शौचालय नहीं बना है, बना तो लेकिन आजतक चालू नहीं हुआ। ऐसे में मजबूरन महिला शिक्षक और छात्राओं को शौच के लिए खुले में जाना पड़ता है।

बात हो रही आजमगढ़ के पूर्व माध्‍यमिक विद्यालय सेहदा की। इस विद्यालय में 105 बच्‍चे अध्‍ययनरत हैं। पठन-पाठन को सुचारू रूप से चलाने के लिए चार महिला शिक्षक, तीन अनुदेशक तैनात की गई हैं। इसके अलाव यहां एक बीटीसी छात्रा यहां ट्रेनिंग कर रही है। स्‍कूल गांव के बाहर है। पास में केवल एक मकान है। स्‍कूल के पीछे और बगल में खेत है। स्कूल में मूलभुत सुविधाओं का भारी अभाव है। स्कूल में न तो चहारदिवारी है, न तो शौच जाने की कोई व्यवस्था और न ही मीड-डे-मील के लिए गैस कनेक्शन। स्‍कूल की चहारदिवारी निर्माण के लिए तीन साल पहले सर्वे हुआ। नापी भी कराई गई लेकिन निमार्ण आज तक नहीं हुआ। यहां विकलांग बच्‍चों के लिए रैंप भी नहीं बना है।

स्‍कूल में शौचालय बनावाया गया लेकिन वो आजतक चालू नहीं हुआ। शिक्षकों के मुताबिक शौचालय के निर्माण में ही खामी है। जिसके कारण वह आजतक चालू नहीं हुआ। मजबूरन शिक्षक और बच्‍चे खुले में शौच और टायलेट के लिए जाते है। इससे खतरा भी बना रहता है। कई बार अधिकारियों से शिकायत की गई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। बच्‍चे भी इस समस्‍या को लेकर काफी दुखी हैं। वहीं रसोइयां चूल्‍हे पर भोजन बनाती है।

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सहायक अध्‍यापक नीलम का कहना है कि सबसे बडी समस्‍या है शौचालय का न होना। मजबूरन सभी को खुले में शौच जाना पड़ता है। कई बार हमने लिखित शिकायत की लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। सहायक अध्‍यापक संध्‍या पांडेय का कहना है कि यहां के लोग बहुत अच्‍छे हैं गांव के लोगों का पूरा सहयोग है लेकिन यहां सबसे बड़ी समस्‍या है शौचालय का न होना। एक महिला के लिए में शौच और टायलेट के लिए बाहर जाना कितना मुश्किल और शर्मिंदगी भरा होता है समझा जा सकता है। विद्यालय में तैनात दोनों रसोइयों का कहना है कि करीब पांच साल पहले विद्यालय में चोरी हुई थी। उसमें चोर सिलेंडर उठा ले गये। तभी से वे चूल्‍हे पर भोजन बनाती हैं। आज तक गैस की व्‍यवस्‍था नहीं हुई।