
जसपाल राणा: 10 साल की उम्र में थामी पिस्तौल, संघर्षों से लिखी सुनहरी कहानी। फोटो सोर्स-पत्रिका न्यूज
Success Story: देश के मशहूर अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज, पद्मश्री और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित जसपाल राणा का निधन हो गया। उनके जाने से भारतीय खेल जगत को अपूरणीय क्षति पहुंची है। जसपाल राणा सिर्फ एक सफल निशानेबाज ही नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक कोच और खेल के प्रति समर्पित व्यक्तित्व भी थे। उनकी बहन सुषमा राणा भी शूटिंग कोच हैं। सुषमा राणा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की बहू हैं और उनके पति पंकज सिंह नोएडा से विधायक हैं।
एक साक्षात्कार में जसपाल राणा ने बताया था कि उन्होंने महज 10 साल की उम्र में शूटिंग शुरू कर दी थी। 11-12 साल की उम्र तक वह राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगे थे। उनके पिता स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (SPG) में तैनात थे। इसी वजह से उन्हें हथियारों और शूटिंग खेल के बारे में करीब से जानने और समझने का अवसर मिला।
राणा ने बताया था कि वह पिस्तौल और राइफल दोनों में दक्ष थे, लेकिन शूटिंग फेडरेशन के नियमों के अनुसार किसी खिलाड़ी को एक ही विधा चुननी होती थी। ऐसे में उन्होंने पिस्तौल शूटिंग को अपना करियर बनाया।
जसपाल राणा अपनी तमाम उपलब्धियों को यादगार मानते थे, लेकिन 1994 की मिलान वर्ल्ड चैंपियनशिप उनके जीवन का सबसे खास पड़ाव रही। उन्होंने बताया था कि प्रतियोगिता से एक रात पहले उनके घुटने में बड़ा फोड़ा हो गया था और हालत इतनी खराब थी कि डॉक्टर्स ने अस्पताल से छुट्टी देने से मना कर दिया था।
इसके बावजूद उनके कोच सनी थॉमस ने प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का फैसला किया और दोनों अस्पताल से निकल गए। उसी रात फोड़ा फूट गया, जिससे उन्हें असहनीय दर्द हुआ। पूरी रात वह सो नहीं सके और डोपिंग नियमों को लेकर असमंजस में होने के कारण उन्होंने कोई दर्द निवारक दवा भी नहीं ली।
हालात ऐसे थे कि वह अपनी जींस तक नहीं उतार पा रहे थे। अगले दिन प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए उन्हें अपनी जींस काटकर शॉर्ट्स बनानी पड़ी। उनका लक्ष्य सिर्फ मुकाबला पूरा करना था ताकि बाद में डॉक्टर के पास जाकर इलाज करा सकें।
प्रतियोगिता खत्म होने के बाद जसपाल राणा सीधे डॉक्टर के पास चले गए। कुछ देर बाद उनके कोच ने आकर बताया कि उन्होंने स्वर्ण पदक जीत लिया है और इसके साथ ही जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया है।
राणा के मुताबिक, उस पल के बाद उन्हें अपने दर्द का एहसास भी नहीं रहा। किसी दूसरे देश में भारत का तिरंगा सबसे ऊपर लहराते देखना और गोल्ड मेडल के साथ देश लौटना उनके जीवन के सबसे गौरवपूर्ण क्षणों में से एक था।
जसपाल राणा का मानना था कि जीवन किसी मंजिल का नाम नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाला सफर है। वह संघर्षों को रुकावट नहीं बल्कि प्रेरणा के रूप में देखते थे। उनके अनुसार चुनौतियां ही इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देती हैं।
टोक्यो ओलंपिक के बाद भारतीय शूटिंग टीम के प्रदर्शन को लेकर कई सवाल उठे थे। उस दौर को याद करते हुए जसपाल राणा ने कहा था कि उन्हें भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा और कई लोगों ने उन्हें खलनायक की तरह पेश करने की कोशिश की, जबकि वह उस समय वहां मौजूद भी नहीं थे।
कोचिंग को लेकर जसपाल राणा की सोच बेहद स्पष्ट थी। उनका मानना था कि एक अच्छे कोच का सबसे बड़ा काम खिलाड़ी की बात सुनना होता है, न कि अपनी राय उस पर थोपना। वह खिलाड़ियों के प्रदर्शन का बारीकी से विश्लेषण करते और फिर उनसे चर्चा करते थे।
उनके अनुसार कोच केवल प्रेरित कर सकता है, लेकिन शूटिंग रेंज में प्रदर्शन आखिरकार खिलाड़ी को ही करना होता है। इसलिए खिलाड़ी और कोच के बीच भरोसे का रिश्ता बेहद जरूरी है।
जसपाल राणा ने कहा था कि कोचिंग उनके लिए केवल एक पेशा नहीं बल्कि जुनून है। उन्होंने कभी किसी ऐसे शूटर को मना नहीं किया, जिसने उनसे मार्गदर्शन मांगा हो। हालांकि वह यह भी मानते थे कि केवल भावनाओं के आधार पर मुकाबले नहीं जीते जा सकते। उनके मुताबिक, एक कोच को खिलाड़ी का दोस्त भी बनना पड़ता है और मार्गदर्शक भी। तभी वह खिलाड़ी से उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन निकलवा सकता है। यही सोच उन्हें एक सफल खिलाड़ी के साथ-साथ एक सम्मानित कोच भी बनाती थी।
Published on:
13 Jun 2026 09:33 am
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