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जिसे आपने देखा, न सुना, ऐसे लुप्त 130 पारंपरिक वाद्य यंत्रों से प्रस्तुति दे रहे ग्राम तवेरा के 14 युवा

छत्तीसगढ़ की लोक कला और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की विश्व में अलग पहचान है। गीत संगीत के बदलते व आधुनिकता के इस दौर में आने वाले पीढ़ी को शायद ही बड़ी संख्या में ये पारम्परिक वाद्य यंत्र न दिखे। लेकिन बालोद जिले के गुंडरदेही विकासखंड के ग्राम तवेरा के युवाओं व बच्चों ने मिलकर लुप्त हो रहे पारंपरिक वाद्य यंत्रों को सहेजने का बीड़ा उठाया है।

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आधुनिकता में विलुप्त हो रहे पारंपरिक वाद्य यंत्र

जिसे आपने देखा, न सुना, ऐसे लुप्त 130 पारंपरिक वाद्य यंत्रों से प्रस्तुति दे रहे ग्राम तवेरा के 14 युवा

सतीश रजक/बालोद. छत्तीसगढ़ की लोक कला और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की विश्व में अलग पहचान है। गीत संगीत के बदलते व आधुनिकता के इस दौर में आने वाले पीढ़ी को शायद ही बड़ी संख्या में ये पारम्परिक वाद्य यंत्र न दिखे। लेकिन बालोद जिले के गुंडरदेही विकासखंड के ग्राम तवेरा के युवाओं व बच्चों ने मिलकर लुप्त हो रहे पारंपरिक वाद्य यंत्रों को सहेजने का बीड़ा उठाया है। 14 लोगों की इस टीम के पास 130 से अधिक पारंपरिक वाद्य यंत्र हैं। इनसे सभी मिलकर विभिन्न मंचों पर प्रस्तुति देते हैं। संजू सेन की यह टीम कोरोना काल के बाद फिर से फार्म पर है। युवकों की इस पहल और सोच की तारीफ लोक गायिका रजनी रजक सहित कई कला के पुजारियों ने की है।

लखनऊ में मिला राष्ट्रीय प्रतिष्ठा सम्मान
जिला प्रशासन सहित संजू सेन को लखनऊ में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा सम्मान से नवाजा जा चुका है। सेन समाज ने उन्हें समाज गौरव सम्मान से सम्मानित भी किया है।

राजधानी में बच्चों को दे रहे प्रशिक्षण
संस्कृति विभाग के प्रशिक्षण शिविर में संजू 50 से अधिक बच्चों को बांसुरी वादन व अन्य वाद्य यंत्रों को बजाने का प्रशिक्षण दे रहें हैं।

छोटे बच्चे भी बेहतरीन कलाकार
संजू सेन खुद बेहतरीन बांसुरी वादक हैं। उन्होंने बताया कि पहले तो इन सभी वाद्य यंत्रों को बजाने में मुश्किलें होती थीं। लेकिन अब पूरी टीम सभी वाद्य यंत्र बजा लेते हैं। जब रक साथ सभी वाद्य यंत्र बजते हैं तो मनमोहक संगीत को सुन लोग थिरकने लगते हैं। टीम में छोटे बच्चे भी हैं जो बेहतरीन वाद्य यंत्र बजा लेते हैं।

लुप्त हो रहे थे, इसलिए यह पहल किया
टीम के सदस्य संजू सेन, चेतन निर्मलकर, प्रकाश सिंह, लक्की, गुरुदयाल, डिकेश्वर, नारद, सोमेंद्र, छत्रपाल, मनीष पटेल ने बताया कि बस्तर की आदिवासी संस्कृति को देख यह प्रेरणा मिली। हमने पाया कि गीत संगीत में आधुनिक वाद्ययंत्र हावी हैं। पारंपरिक वाद्य यंत्र विलुप्त हो रहे हैं। इसलिए यह पहल किया। धीरे-धीरे वाद्य यंत्रो को इक_ा किया फिर इन्हें बजाने के साथ लोगों को इसके बारे में बता भी रहें है।

ये पारंपरिक वाद्य यंत्र जो अब दिखाई नहीं देते
खंजेरी, मोहरी, खड़ताल, चटका, अलगोजवा, चांग, डमरू, मंजीरा, गुदुम, झुंझनी, डफरा, ताशक आदि। इन पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ अपनी कला का प्रदर्शन इस टीम में जगदलपुर फोक, रायपुर सिटी मॉल और प्रदेश के बाहर भी कई स्थानों में दे चुके हैं।