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500 बच्चों ने उतारी आरती तो माता-पिता के आंखों से छलके आंसू

सरदार पटेल मैदान में पाश्चात्य संस्कृति वैलेंटाइन-डे के दिन मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाया गया। 500 बच्चों ने मां-पिता की पूजा-अर्चना की। बच्चों ने पूजा की थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की पूजा की।

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मातृ-पितृ पूजन दिवस: सरदार पटेल मैदान में आयोजित कार्यक्रम में माता-पिता की परिक्रमा कर बच्चों ने गले लगाया

500 बच्चों ने उतारी आरती तो माता-पिता के आंखों से छलके आंसू

बालोद. गुरुकृपा हरिओम साधक परिवार, योग वेदांत समिति व पुरुषोत्तम राजपूत की ओर से जिला मुख्यालय के सरदार पटेल मैदान में पाश्चात्य संस्कृति वैलेंटाइन-डे के दिन मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाया गया। 500 बच्चों ने मां-पिता की पूजा-अर्चना की। बच्चों ने पूजा की थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की पूजा की। माता-पिता के प्रति बच्चों के इस प्रेम को देखकर उनकी खुशी आंसू बनकर छलक पड़े। जिले में इस आयोजन का सातवां साल है। इस दौरान बच्चों ने भक्ति गीत और भजनों की प्रस्तुति भी दी।

मां-पिता को प्रणाम कर लगाया गले
जिलेभर से आए बच्चों ने अपने माता-पिता को सबसे पहले आसन पर बिठाया। पूजा की थाली में अक्षत, रोली, गुलाल और फूल लेकर पूजन-अर्चन किया। सबसे पहले सिर पर पानी छिड़के फिर रोली लगाया। दीपक से आरती उतारी और उनके चरणों में गुलाब फूल अर्पण कर मुंह मीठा कराया। प्रणाम कर माता-पिता की परिक्रमा कर उन्हें गले लगाया। कार्यक्रम में तीन साल के बच्चे से लेकर युवक और युवतियां सहित माता-पिता शामिल थे।

विरोध न कर लंबी लाइन खींचने का प्रयास
आयोजक पुरुषोत्तम राजपूत ने बताया कि 14 फरवरी को पूरी दुनिया वैलेंटाइन-डे (प्रेम दिवस) के रूप में मनाती है। यह संस्कृति भारत में भी धीरे-धीरे पनप रही है। यहां के बच्चों को पुरानी भारतीय संस्कृति से परिचित कराने कार्यक्रम का आयोजन किया गया। संस्था का उद्देश्य वैलेंटाइन-डे का विरोध करना नहीं बल्कि अपनी संस्कृति से आज की पीढ़ी को अवगत कराकर अपनी लाइन बढ़ाना है। उन्होंने लोगों से अपील की है 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे नहीं बल्कि अपने माता-पिता का पूजन कर मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाएं।

वैलेंटाइन-डे हमारी संस्कृति नहीं

पालक देविका, नंदनी, रामसिंह ने कहा कि पहली बार इस तरह के आयोजन में अपने बच्चों के साथ शामिल हुई। बहुत अच्छा लगा कि आज अपने बच्चों ने हमें इतना प्यार दिया। 14 फरवरी को देश में वैलेंटाइन-डे मना रहे है, वह गलत है। यह हमारी संस्कृति नहीं है बल्कि पाश्चात्य संस्कृति है। कंचन साहू ने कहा कि बच्चों के इस संस्कार को देखकर लग रहा है कि ये सभी संस्कारित बच्चे बुढ़ापे में मां-बाप की