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बरसात में तैरने लगता है छत्तीसगढ़ का यह गांव, पहुंचने के लिए इस्तेमाल होता है नाव

बरसात में तैरने लगता है छत्तीसगढ़ का यह गांव, पहुंचने के लिए इस्तेमाल होता है नाव

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CG News

बरसात में तैरने लगता है छत्तीसगढ़ का यह गांव, पहुंचने के लिए इस्तेमाल होता है नाव

रायपुर/मैनपुर. छत्तीसगढ़ में एक गांव ऐसा भी है जो बरसात के मौसम में उफनते नदी नाले के बीच तैरता रहता है। हर साल हल्की सी बारिश में लोगों की सांस अटक जाती है। चलिए आपको बता देते हैं कि सच में छत्तीसगढ़ में एक ऐसा भी है तो चार माह तक तैरता रहता है। दरअसल देश में हीरा खदान के रूप में पहचाना जाने वाला गरियाबंद जिले का एक गांव जो बरसात के मौमस में चार महीने तक टॉपू में तब्दील हो जाता है। आदिवासी ग्रामीण इस कदर गांव में कैद हो जाते हैं कि एक अदद खुली हवा में सांस लेने को तरसते हैं। गरजते बादल और भारी बारिश को चुनौती देते हुए गांव के लोग जान जोखिम में डालकर उफनते हुए नदी-नाले को पार करते हैं।

गरियाबंद मुख्यालय के दूरस्त जंगल में दो नदियों से लगे ग्राम पयलीखण्ड बारिश के दिनों में टापू बन जाता है। उदंती और इंद्रावन नदी बारिश के मौसम में उफान पर रहती है। जिसके चलते इससे सटे पयलीखण्ड नदी पूरे चार माह उफान पर रहती है। जुलाई से सितम्बर व अक्टूबर तक इस विशाल नदी में पानी भर रहता है। इसके कारण यहां के ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गांव में आधे लोगों के पास बाइक तो है, लेकिन बारिश के चार माह वे बाइक को अपने घर तक नहीं ले जा सकते।

चार माह तक भरा रहता है पानी
मैनपुर से लगभग 39 किमी दूर पायलीखंड के शासकीय प्राथमिक और मिडिल स्कूल में बारिश के इन दिनों में शिक्षक कमर तक नदी में पानी को पार कर स्कूल पहुंच बच्चों को पढ़ाते हैं। उदंती सहित क्षेत्र के सभी छोटी बड़ी नदी नाले पायलीखंड नदी में मिले होने के कारण बारिश के दिनों में यहां चार माह तक लगभग कमर तक पानी हमेशा चलते रहता है।

जान-जोखिम में डालकर पार करते हैं नदी
यहां के ग्रामीणों को भी राशन चांवल, दाल, शक्कर तेल व अन्य जरूरी सामग्री के लिए पानी से लबालब नदी को पार कर आना पड़ता है। गांव में कई लोगों के पास बाइक भी है, लेकिन वे बारिश के दिनों बाइक को अपने घर तक नहीं ले जा सकते हैं। नदी के इस पार बाइक को रख देते है, पैदल नदी पार कर 3 किमी चल कर ही गांव पहुंचते हैं, लेकिन उनके बाइक दोपहिया वाहन को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। इस क्षेत्र के लोगों को मालूम है, कि ये बाइक ग्राम पायलीखंड निवासियों का है। वे मजबूरी में नदी के इस पार छोड़कर गए हुए हैं।

यहां विशेष पिछड़ी भुंजिया जनजाति करते हैं निवास
ग्राम पंचायत जांगड़ा के आश्रित ग्राम पयलीखण्ड की जनसंख्या लगभग 200 के आसपास है। यहां विशेष पिछड़ी भुंजिया जनजाति के लोग निवास करते हैं। गांव में स्वास्थ्य की कोई भी सुविधा नहीं है। बिजली अब तक नहीं लग पाई है। रात के अंधेरे दूर करने दो लीटर मिट्टी तेल के लिए इस विशाल नदी को पार कर जांगड़ा राशन लेने आना पड़ता है। तब कहीं जाकर लोगों के घरों में लालटेन की रौशनी हो पाती है। प्राथमिक शाला में इस वर्ष 23 छात्र छात्राएं एवं मिडिल स्कूल मे 13 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत है। इन्हें पढ़ाने के लिए शासन द्वारा 4 शिक्षक की व्यवस्था की गई है। ये शिक्षक प्रतिदिन इसी तरह इस पायलीखंड बड़ी नदी को पारकर स्कूल पहुंचकर बच्चों को शिक्षा देने मजबूर हो रहे हैं।

शिक्षक नदी पार जाते हैं स्कूल
कभी-कभी तो शिक्षकों को नदीपार करने मे बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अचानक तेज बहाव से जान जोखिम में रहती है। सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पायलीखंड में मिडिल स्कूल निर्माण के लिए 6 लाख रुपए की राशि 8 वर्ष पहले जारी की गई थी, लेकिन आजतक भवन निर्माण अधूरा है। मिडिल स्कूल प्राथमिक शाला के बच्चे एक कमरे मे पढऩे के लिए मजबूर हो रहे हंै। स्कूल का शौचालय भी अधूरा है। ऐसा नहीं है कि यहां के ग्रामीणों ने इस नदी में पुल निर्माण की मांग न किया हो कई बार पुल निर्माण के लिए क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों सहित आला अधिकारियों को आवेदन निवेदन ज्ञापन देकर थक चुके हैं।

इलाज के लिए कांवर में लाते हैं मरीज को
ग्रामीण बीमार होने पर बारिश के चार महीने उन्हें बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यहां तक की गर्भवती मंहिलाओं को भी इलाज के लिए कांवर में बिठाकर जांगड़ा तक लाना पड़ता है। जांगड़ा तक भी सड़क का निर्माण नहीं होने से यहां के लोगों को संजीवनी एक्सप्रेस 108 का भी लाभ आपातकाल में नहीं मिला पाता। इस गांव के पांच छात्र-छात्राएं हाई स्कूल बरगांव में पढ़ाई करते हैं। उन्हे इस नदी में जान जोखिम में डालकर रोज स्कूल जाना पड़ता है। अकेला नदी पार करना एक आदमी के लिए संभव नहीं इस लिए गांव के लोग राशन लेने समूह में आते हैं।

सरंपच ने कहा चार महीने के लिए टापू बन जाता है यह गांव
ग्राम पंचायत जांगड़ा के सरपंच चमारसिंह ने बताया बारिश के चार माह पयलीखण्ड टापू बन जाता है। कई बार पुल निर्माण के लिए आवेदन देकर थक चुके हैं। अधिकारियों के द्वारा पूर्व में पुल निर्माण के लिए सर्वे भी किया जा चुका है, लेकिन अब तक पुल निर्माण नहीं होने से यहां के लोग जान जोखिम मे डालकर आना-जाना करने मजबूर हो रहे हैं।

शिक्षक पारेश्वर पटेल ने बताया कि ग्राम पयलीखण्ड में किराए के आवास नहीं होने के कारण उन्हें नदी इस पार दूसरे गांव मे निवास करना पड़ता है। बारिश के पूरे चार माह नदी में बाढ़ को पार कर स्कूल जाना पड़ता है। बाइक को नदी के किनारे रखकर पैदल 3 किलोमीटर चलना पड़ता है।