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51 शक्तिपीठों में से एक मां देवीपाटन शक्तिपीठ, दर्शन मात्र से हो जाती है सभी मनोकामना पूरी

51 शक्तिपीठों में से एक मां देवीपाटन शक्तिपीठ माता सती के वाम स्कंध गिरने के कारण यह स्थल सिद्ध पीठ बना।

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बलरामपुर. 51 शक्तिपीठों में से एक मां देवीपाटन शक्तिपीठ माता सती के वाम स्कंध गिरने के कारण यह स्थल सिद्ध पीठ बना। चैत्र नवरात्रि में यहां देश विदेश से श्रद्धालु मनोकामना पूर्ती के लिए दर्शन करने आते है। इस दौरान मंदिर प्रांगण में एक माह तक चलने वाले भव्य मेले का आयोजन भी होता है। वहीं शारदीय नवरात्रि में नौ दिन तक मां भगवती की विशेष पूजन अर्चन होती है।


भारत नेपाल सीमा की निकटता तथा उभय राष्ट्रोें की धार्मिक एक रूपता के कारण यह पावन स्थल दोनों ही देशो के करोड़ो श्रद्धालुओं की धार्मिक एवं सांस्कृतिक एक रूपता को भी परिलक्षित करता है। सामान्यतया अश्विन तथा चैत्र नवरात्र पर्व पर यह पीठ अनुष्ठान की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। चैत्र नवरात्र पर्व का शुभांरभ के साथ एक माह के मेले की भी शुरूआत हो जाती है। जिससे एक माह तक तुलसीपुर नगर सहित आसपास का क्षेत्र श्रद्वालुओं का केन्द्र बना बना रहता है। स्कंद पुराण के अनुसार प्रजापति दक्ष के यज्ञ कुण्ड में माता सती ने भगवान शिव के अपमान से आहत होकर प्रवेश कर अपने शरीर का त्याग कर दिया। यह समाचार सुनकर भगवान शिव यज्ञ स्थान पर पहुंचे। व्यथित शिव ने अपने कन्धे पर माता सती का शरीर रखकर इधर उधर घूमना शुरू कर दिया। इससे सृष्टि के संचालन में बाधा उत्पन्न होने लगी। देवताओं के कहने पर भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर को काटकर गिराना शुरू किया। जिन 51 स्थानों पर सती के अंग गिरे वह सभी शक्तिपीठ कहलाए।

देवीपाटन में सती का वाम स्कंध पट सहित गिरा जिससे यह स्थल सिद्धपीठ देवीपाटन के रूप में विख्यात हुआ। एक मान्यता यह भी है कि भगवती सीता ने इस स्थल पर पाताल प्रवेश किया था। इस कारण पहले यह पातालेश्वरी कहलाया और बाद में यह पाटेश्वरी हो गया लेकिन सती प्रकरण ही अधिक प्रमाणिक है और शक्ति के आराधना स्थल होने के कारण यह शक्तिपीठ प्रसिद्ध है। नाथ सम्प्रदाय की व्यवस्था में होने के कारण ही सती प्रकरण की पुष्टि होती है क्योकि भगवान शंकर स्वरूप गोरखनाथ जी ने भव्य मंदिरो का निर्माण कराया। शारदीय नवरात्रि में यहां देश विदेश के भक्तों का हुजूम उमड़ पड़ता है।


मां देवी पाटन धार्मिक तीर्थ महत्व का इतिहास
देवी पाटन के निकट कुछ धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल भी शामिल है जिनमें से सूर्यकुण्ड, करबान बाग, सिरिया नाला, धौर सिरी, भैरव मंदिर आदि प्रमुख है। यह पुण्य स्थल अपनी-अपनी जगह अहम भूमिका के लिए विख्यात हैं।

सिरिया नदी

एक बार महाराजा कर्ण से स्थानीय जनता ने प्रार्थना की कि महाराज मन्दिर के निकट एक नदी भी होनी चाहिए, इससे मन्दिर की अपूर्व शोभा होगी, मेले में आये हुए जन समुदाय को नहाने धोने का कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न्ा होगा, पशु-पक्षियों को पेयजल सुगमता से प्राप्त होगा। जन समुदाय के इस प्रकार की प्रार्थना को सुनकर उन्होनंे जन कल्याण के लिए धनुश पर एक तीर रखकर पृथ्वी पर छोड़ा तीर ज्यों ही धरती में प्रविष्ट हुआ त्यों ही नदी प्रगट हो गयी। चूंकि तीर के द्वारा इस नदी की उत्पŸिा हुई इसलिए नदी का नाम तिरिजा नदी रखा गया जिसका कालान्तर में सिरिया नाम हो गया और कुछ दिनों बाद यह पहाड़ी नाला के रूप में परिवर्तित हो गयी।

सूर्यकुण्ड

पुराणों के कथानुसार महाभारत काल के सूर्य पुत्र महाराजा कर्ण भी देवी पाटन भगवती के भक्त थे। जब उनको अवसर मिलता था तो यहां आकर रूककर माँ भगवती जी की आराधना करते थे। चैत्र नवरात्रि और अश्विन नवरात्रों में अवश्य आते थे। नवरात्रि व्रत करते थे तथा पंडितों के माध्यम से शत चण्डी तो कभी सहस्त्र चण्डी महायज्ञ का आयोजन करते थे। उन्होंने अपने पिता सूर्य भगवान की पुण्य स्मृति में मन्दिर के उपर भाग में एक पोखरा बनवाया जो सूर्यकुण्ड के नाम से विख्यात है। पूर्व काल में यह बहुत सुन्दर और विशाल रूप में था पर समय के प्रभाव से अब इसका रूप वह नहीं रहा। वर्तमान में यह साधारण कुण्ड के रूप में परिवर्तित हो गया है लेकिन माँ भगवती के कृपा से इसका अस्तित्व अभी भी बरकरार है।


करबान बाग

भगवती जी के अन्न्ाय उपासक महाराजा कर्ण ने एक बाग भी लगवाया था। बाग में सुन्दर-सुन्दर फल के वृक्ष लगवाये थे, जिनके फल मन्दिर में आते थे। भगवती जी का भोग लगता था जो प्रसाद के रूप में उपस्थित जन समुदाय को भी प्राप्त होता था। समय के फेर से अब बाग का वह रूप नहीं रहा, वृक्ष बहुत कम रह गये, लेकिन करबान बाग अब भी अमर है। करबाना शुद्ध शब्द कर्णवान है बान यह संस्कृत के मतुप प्रत्यय वाले शब्द का रूप है जो कभी वान होता है कभी मान होता है जिसका अर्थ होता है वाला।यहां पर एक बड़ा पशु मेला भी लगता है।


धौर सिरी

बादशाह औरंगजेब ने भगवती पाटन देवी की शक्ति की परीक्षा करने हेतु एक बार अपनी विशाल सेना के साथ एक फौजी अफसर को भेजा। उसने मन्दिर पर आक्रमण किया तब भगवती जी सारंग मक्षी के रूप में प्रगट हो गयी और सब को छेदना शुरू कर दिया। फौजी अफसर ज्यों ही धौर सिरी स्थान पर पहुँचा त्यों ही आकस्मात उसके धड़ से उसका सिर कट कर धरती पर गिर पड़ा। तब से उस स्थान का नाम धरा सिर पड़ा जो कालान्तर में धौर सिरी के नाम से विख्यात है।