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मकर संक्रांति पर यहां लगता है ‘आशिकों का मेला’, प्रेमियों की हर मन्नत पूरी करती हैं ‘राजकुमारी सुनलिका’

UP News: उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में एक ऐसा किला है। जहां हर साल मकर संक्रांति पर ‘नटवली का मेला’लगता है। इसे 'आशिकों का मेला' भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां आने वाले प्रेमी जोड़ों की हर मन्नत पूरी होती है। आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी...

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Bhuragarh Fort Fair in Makar Sankranti: मकर संक्रांति इस साल 15 जनवरी 2024 को मनाई जाएगी। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसलिए इसे मकर संक्रांति कहा जाता है। पूरे देश में अलग-अलग नाम और परंपरा के हिसाब से इस त्योहार को मनाया जाता है। वहीं उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में इस दिन अनोखा मेला लगाया जाता है। इसके ‘नटवली का मेला’ कहा जाता है। मान्यता है कि इस मेले में आकर जो प्रेमी जोड़े दीवारों पर अपना नाम लिखकर जाते है। उनकी एक साल के भीतर मन्नत पूरी होती है। इसलिए इसे 'आशिकों का मेला' भी कहा जाता है।


यूपी के बांदा जिले में स्थित भूरागढ़ किले के चर्चे दूर-दूर तक हैं। कहा जाता है कि यहां हर साल मकर संक्रांति पर लगने वाले 'आशिकों का मेले' में प्रेमियों का भारी हुजूम उमड़ता है। कहा जाता है कि इस किले में मोहब्बत की एक सुनहरी दास्तां दर्ज है। हर साल मकर संक्रांति पर मेले का आयोजन होने के पीछे की वजह भी एक प्रेम कहानी ही है। जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। यह कहानी एक नट और राजकुमारी सुनलिका की है, जो आज भी प्रेमियों के लिए मिसाल है। केन नदी किनारे स्थित इस किले में हर साल मकर संक्रांति पर नटवली और उसकी प्रेमिका की याद में ‘आशिकी का मेले’ का आयोजन किया जाता है।


इतिहासकारों की मानें तो तकरीबन 600 साल पहले भूरागढ़ दुर्ग किले के किलेदार की बेटी सुनलिका को एक नट को प्यार हो गया था। दोनों की प्रेम कहानी परवान चढ़ी तो राजकुमारी सुनलिका ने अपने पिता यानी किलेदार को इसकी जानकारी दी। राजकुमारी सुनलिका ने किलेदार को बताया कि वह एक नट से प्यार करती है और शादी करना चाहती है। यह सुनकर पहले तो किलेदार नाराज हुए, लेकिन बेटी की जिद के आगे वह हार गए। इसके बाद उन्होंने राजकुमार सुनलिका और नट की शादी कराने के लिए एक शर्त रख दी।


बेटी की जिद के आगे हार मान चुके किलेदार ने नट के सामने एक अजीब सी शर्त रखी। किलेदार ने नट से कहा कि अगर वह सूत की रस्सी के सहारे नदी पार कर लेता है तो उसके साथ वह अपनी बेटी की शादी कर देंगे। नट ने किलेदार की इस शर्त को स्वीकार कर लिया और शर्त पूरी करने के लिए मकर संक्रांति का दिन तय किया। मकर संक्रांति के दिन शर्त के अनुसार नट ने सूत की रस्सी के सहारे नदी पार करना शुरू किया।

कहा जाता है कि नट लगभग आधी से ज्यादा नदी पार कर चुका था। नट को रस्सी पर आराम से चलता देख किलेदार ने रस्सी काट दी। बीच धारा में अचानक गिरने से नट की मौत हो गई। इसके बाद राजकुमार सुनलिका ने नट की याद में किले के पास एक मंदिर बनवाया। जहां हर मकर संक्रांति पर प्रेमी जोड़े मन्नत मांगने आते हैं।