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तेल की कीमतों में कटौती का लाभ फुर्र

रोजाना वृद्धि की मार: दस दिन भी नहीं मिली उपभोक्ताओं को राहत कीमतें फिर वहीं पहुंची जहां कटौती से पहले थीं

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तेल की कीमतों में कटौती का लाभ फुर्र

बेंगलूरु. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के कारण सरकार की ओर से दी गई फौरी राहत भी दस दिनों में ही फुर्र हो गई है। पिछले दस दिनों में ही कीमतें बढ़कर फिर वहीं आ गई जहां कटौती से पहले थी।

दरअसल, केंद्र सरकार ने पिछले 5 अक्टूबर को ही पेट्रोल और डीजल पर 1.50 रुपए उत्पाद शुल्क घटाने की घोषणा की थी। साथ ही सरकारी कंपनियों से प्रति लीटर 1 रुपए की कटौती करने को कहा था। इससे कीमतों में गिरावट आई और पेट्रोल 84.72 रुपए से घटकर 81.45 रुपए प्रति लीटर तथा डीजल 75.89 रुपए प्रति लीटर से घटकर 72.94 रुपए प्रति लीटर हो गया।

लेकिन, उपभोक्ताओं को इस कटौती का लाभ दस दिन भी नहीं मिला। अब कीमतें चढ़कर फिर वहीं पहुंच गई हैं। तेल की खुदरा कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुसार रोजना निर्धारित होती हैं और पिछले दस दिनों के दौरान एक पैसे की कटौती तो नहीं हुई अलबत्ता कीमतें बढ़ती रहीं। यहां तक की सोमवार को पेट्रोल की कीमतें भले ही स्थिर रहीं लेकिन डीजल पर प्रति लीटर 8 पैसे की बढ़ोतरी हुई।

सोमवार को पेट्रोल की कीमतें चढ़कर 83.37 रुपए प्रति लीटर और डीजल की कीमतें 75.90 रुपए प्रति लीटर हो गईं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण केंद्र या राज्य सरकारों की ओर से की गई कटौती का कोई लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिल रहा है।

राज्य सरकार ने भी पिछले 17 सितम्बर को कीमतें घटाई थीं। मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी की ओर से कीमतों में कटौती की घोषणा के बाद पेट्रोल के भाव 84.59 रुपए प्रति लीटर से घटकर 82.82 रुपए प्रति लीटर और डीजल के भाव 75.77 रुपए प्रति लीटर से घटकर 74.35 रुपए प्रति लीटर हो गए थे। इन दोनों कटौतियों का कोई लाभ अब उपभोक्ताओं को नहीं मिल रहा है।

अखिल भारतीय पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एम.प्रभाकर रेड्डी ने कहा कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण सरकार द्वारा करों में कटौती का लाभ अब उपभोक्ताओं को नहीं मिल रहा है। अगर सुधार के लिए तुरंत उचित कदम नहीं उठाए गए तो इससे ऐसा संकट पैदा होगा जिसका हल निकालना मुश्किल होगा।

वहीं कर्नाटक एसोचैम के अध्यक्ष एस.संपतरमण ने कहा कि जीएसटी काल में निर्यात में मामूली सुधार नजर आ रहा है। निर्यात में लगातार गिरावट के कारण व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा है और रुपया दिनों-दिन कमजोर हो रहा है।

इससे आयात लागत बढ़ रही है। कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। उधर, निर्यातकों का कहना है कि जीएसटी रिफंड में हो रही देरी के कारण उनके कारोबार पर विपरीत असर पड़ रहा है। उनका दावा है कि सरकार के पास 23 हजार करोड़ रुपए जीएसटी रिफंड लंबित हैं जिससे उनकी कार्यकारी पूंजी फंस गई है।

हालांकि, सरकार का कहना है कि यह राशि बढ़ा-चढ़ाकर बताई जा रही है। भारतीय निर्यात संघ एफआईईओ के अध्यक्ष (दक्षिणी क्षेत्र) डॉ.ए शक्तिवेल ने कहा कि ये दावे सही हैं और वास्तविकता यह है कि सरकार इस मुद्दे को सुलझाने पर ध्यान नहीं दे रही है।