
महज जीने के लिए खाएं, खाने के लिए नहीं जीएं
बेंगलूरु. जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में महावीर धर्मशाला में जयधुरन्धर मुनि ने कहा कि एक सामान्य जन भी खाता पीता है और एक जैन भी, लेकिन दोनों में अंतर यह होता है कि श्रावक के खान पान में भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक रहता है। उन्होंने कहा कि क्यों खाना? क्या खाना? कितना खाना? कब खाना? उसे यह सारा बोध रहता है। वह जीने के लिए खाता है, खाने के लिए नहीं जीता, वहां त्याग वृति जुड़ी रहती है। डॉ पद्मचंद्र द्वारा संकलित 'श्रावक के 12 व्रत' पुस्तक का विमोचन रानीबाई प्रवीण कुमार सियाल द्वारा किया गया।
काल किसी को नहीं छोड़ता
मैसूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ सिद्धार्थनगर सीआइटीबी परिसर में श्रुत मुनि ने 'आत्म सफलता के लिए कालवान बनोÓ का अर्थ बताते हुए कहा कि समयचक्र में तीन काल भूतकाल, भविष्यकाल व वर्तमानकाल होते हैं। काल राजा, रंक, देव, इंद्र, अमीर, गरीब, ज्ञानी, मूर्ख सभी के साथ में बंधा हुआ है। किसी को नहीं छोड़ता है।
उन्होंने कहा कि काल न घटाया जा सकता है न ही बढ़ाया जा सकता है। भूतकाल को ज्यादा याद नहीं करना, भूतकाल से सीख लेते हुए वर्तमानकाल में सुधार करते हुए भविष्य सवांरने का कृत संकल्प लेना चाहिए। समय की चकाचौंध में खाने में, बोलने में, सोने में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। भगवान महावीर ने अपनी साधना में मात्र 48 घंटे निद्रा में व्यतीत किया। अत: ज्ञानीजन कहते है जो समय निकल गया वह वापस आने वाला नहीं है। समय का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए।
काल के अनुसार खानपान में, वेशभूषा, भाव, स्वभाव, परिधान में विचार बदलते रहते है। काल सर्वस्त्र अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहता है। भगवान महावीर ने गौतम स्वामी से कहा है गौतम काल सर्वोपरि है पल मात्र का भी प्रमाद मत करो जो समय को समाज लेता है उसका जीवन सफल बन जाता है। रविवार को सर्वविधि कार्य मनोरथ साधना का सामूहिक जाप होगा।
Published on:
12 Oct 2018 06:19 pm
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