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णमो आयरियाणं पद का विवेचन: गुरु होते हैं शिष्य के भाग्य विधाता

रणजीत कुमार ने कहा कि जैन धर्म में आचार्य का विशिष्टम स्थान है, वे धर्माचार्य कहलाते हैं

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णमो आयरियाणं पद का विवेचन: गुरु होते हैं शिष्य के भाग्य विधाता

बेंगलूरु. मुनि रणजीत कुमार एवं मुनि रमेश कुमार के सान्निध्य में यशवंतपुर स्थित तेरापंथ भवन में नमस्कार महामंत्र साधना और प्रयोग सप्ताह के अंतर्गत बुधवार को णमो आयरियाणं पद का विवेचन किया गया। मुनि रमेश कुमार ने प्रयोग कराये। आचार्य की अर्हताओं को बताते हुए मुनि रणजीत कुमार ने कहा कि जैन धर्म में आचार्य का विशिष्टम स्थान है। वे धर्माचार्य कहलाते हैं।

उन्हें हम गुरु भी कहते हैं। धर्म पद की शिक्षा देने वाले आचार्य या गुरु कहलाते हैं। उनका कार्य होता है शिष्यों की वृद्धि करना। उनको संस्कारी बनाना। गुरु शिष्य के भाग्य विधाता होते हैं। गुरु कुशल चित्रकार होते हैं। वह शिष्य की योग्यता को देखकर उसकी क्षमता के अनुसार विकास करते हैं। शिष्य की सेवा, समर्पण और गुरु का वात्सल्य ये जब आपस में एकाकार हो जाते हैं तो उन शिष्यो का विकास होता है। इसीलिए गुरु भाग्य विधाता होते हैं। पीले रंग का वलय बनाकर णमो आयरियाणं का जाप करना चाहिए।

मुनि रमेश कुमार ने कहा कि आचार्य धर्म के आलोक से आलोकित होते हैं। प्रबल प्राणशक्ति वाला व्यक्तित्व गुरुता के बिंदु तक पहुंचता है।
आचार्य या गुरु में शिष्य निर्माण की कला होती है। गुरु की आज्ञा व उपदेश स्वाति नक्षत्र की उन बूंदों के समान है जिन्हें चातक रूपी शिष्य भली-भांति ग्रहण कर करते हैं। वह बूंदें हृदय रूपी सीप में ढलकर दर्शन के मोती बनते हैं।

मुनि रमेश कुमार ने गुरु पद के गौरव को बताते हुए कहा कि गुरु के उपकारों से शिष्य कभी उऋण नहीं हो सकता। शिष्य का दायित्व होता है कि वे सदा गुरु को प्रसन्न रखें। गुरु के अप्रसन्न होने से बोधि लाभ नही मिलता। कभी भी गुरु की अवज्ञा या आशातना नहीं करनी चाहिए। बिन्दु रायसोनी ने आठ दिन की तपस्या में मुनिद्वय के दर्शन किये। तेरापंथ सभा के मंत्री गौतम मुथा, तेरापंथ महिला मंडल की अध्यक्षा अरुणा महनोत ने तपस्वी का स्वागत किया।