
गिरीश कर्नाड : भाषिक-सांस्कृतिक सेतुबंध के संवाहक
प्रियदर्शन शर्मा
गिरीश कर्नाड लेखन, रंगमंच और फिल्म जगत को अपनी साहित्यिक एवं कलात्मक प्रतिभा का लोहा मनवाने के साथ ही जीवन के आठवें दशक में भी लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सदैव बौद्धिक समाज की वैध चिंताओं की मुखर आवाज बने रहे। जीवन पर्यंन्त भाषिक-सांस्कृतिक सेतुबंध के पर्याय रहे कर्नाड ने अपने नाटकों और कलात्मकता के जरिए पूरे देश को एकसूत्र मे बांधने का काम किया।
कन्नड़ में नाटक लेखन के जरिए पेशेवर जीवन की शुरुआत करने वाले गिरीश कर्नाड ने उस भ्रांति को तोडऩे का काम किया कि एक भाषा में लिखी बातें दूसरी भाषा के लोगों को आसानी से ग्राह्य नहीं होती। कर्नाड ने इससे इतर कन्नड़, हिंदी और अंग्रेजी में लेखन एवं अनुवाद का अद्भुत समिश्रण पेश किया, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली।
कई भाषाओं में हुआ नाटकों का अनुवाद
स्वतंत्रता बाद के आधुनिक भारत में गिरीश कर्नाड एकमात्र ऐेसे कन्नड़ लेखक हुए जिनके लिखे नाटकों का सर्वाधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ। हिंदी में अनुदित कर्नाड के नाटकों का मंचन आज भी आए दिन होता रहता है। वे कन्नड़ भाषी थे मगर हिंदी में किए गए उनके काम सदा बोलते रहे। उन्होंने कन्नड़ और हिंदी के बीच सेतुबंध का काम किया। नाटक और फिल्मों के जरिए उन्होंने दोनों भाषाओं को शीर्ष मुकाम पर पहुंचाया। कर्नाड की इसी खासियत के कारण अपने शोक संदेश में मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने उन्हें 'सांस्कृतिक दूतÓ करार दिया। उनकी इसी बहुमुखी प्रतिभा के कारण राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष सहित दर्जनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और कला जगत के लोगों ने उनका स्मरण किया।
ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाया
वर्ष 1960 के दशक में जब गिरीश कर्नाड का रुझान लेखन की ओर बढ़ा तब कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था। लेखकों के बीच किसी ऐसी चीज के बारे में लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नई थी। इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया तथा काफी लोकप्रिय हुए। कर्नाड को 1961 में उनके प्रथम नाटक 'ययातिÓ और बाद में 1964 में 'तुगलकÓ से विशेष पहचान मिली। उन्होंने अपना पहला नाटक कन्नड़ में ही लिखा था, जिसका बाद में अंग्रेज़ी अनुवाद किया। उनके नाटकों में ययाति, तुगलक, हयवदन, अंजु मल्लिगे, अग्निमतु माले, नागमंडल, अग्नि, बरखा आदि बहुत प्रसिद्ध हुए।
रंगमंच सा रहा कर्नाड का जीवन
19 मई 1938 को कोंकणी भाषी परिवार में जन्मे गिरीश कर्नाड ने 1958 में धारवाड़ स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि हासिल की थी। इसके बाद वे एक रोड्स स्कॉलर के रूप में इंग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड के लिंकॉन तथा मॅगडेलन महाविद्यालयों से दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। गिरीश कर्नाड शिकागो विश्वविद्यालय के फुलब्राइट महाविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे। कर्नाड के जीवन की यह अनोखी उपलब्धि रही कि वे मैथेमेटिक्स और स्टेटिक्स में बैचलर ऑफ आट्र्स थे लेकिन उन्होंने लेखन और कला जगत में अपना सिक्का जमाया।
वर्ल्ड थिएटर के राजदूत रहे कर्नाड
गिरीश कर्नाड को यूनेस्को के अंतरराष्ट्रीय थिएटर इंस्टीट्यूट द्वारा वल्र्ड थिएटर का राजदूत बनाया गया था। पेरिस स्थित संगठन ने यह विशिष्ट सम्मान एक दर्जन कालाकारों को दिया, जिसमें ब्रिटिश थिएटर और फिल्म निर्देशक पीटर बरूक, इटली के नाटककार डेरियो फो, फ्रांस के नाटककार एरियन माउचिनके तथा जर्मनी के नृत्य निर्देशक पिना बास्क जैसे नाम रहे। इसमें कर्नाड भी शामिल थे।
'मालगुडीजडेज' व 'टर्निंग प्वाइंट' से टीवी जगत में छोड़ी छाप
टेलीविजन पर प्रसारित बहुचर्चित नाट्य शृंखला आरके नारायण के 'मालगुडीजडेज' में उन्होंने स्वामी के सख्त पिता की भूमिका निभाई और घर घर में कर्नाड की पहचान बनी। बाद में 90 के दशक में उन्होंने दूरदर्शन पर 'टर्निंग प्वाइंट] का संचालन किया।
कई सम्मान से अलंकृत
कर्नाड को 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1974 में पद्मश्री, 1992 में पद्मभूषण, 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1998 में कालिदास सम्मान, कन्नड़ फिल्म 'संस्कारÓ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
कवि बनना चाहते थे कलाकारों के कलाकार
गिरीश कर्नाड ने अपने एक संस्मरण में कहा था कि 'कर्नाटक के एक छोटे-से गांव सिरसी में मुझे बचपन में ही लोकनाट्य का चस्का लग गया था। तब नाटक कंपनियां घूम-घूमकर नाटक किया करती थीं। मेरे पिता पूरे परिवार को नाटक दिखाने ले जाया करते थे। वे नाटक कंपनियां पारसी थिएटर की अनुकृतियां होती थीं। पेट्रोमैक्स की रोशनी में खेले जाने वाले उन नाटकों की स्मृतियां मुझे आज भी हैं। फसल कट जाने के बाद मैं कई बार अपने नौकर के साथ यक्षगान देखने जाता था, जो ज्यादा पारंपरिक माने जाते थे। खुली जगह पर मंच बनाया जाता था, जो काले पर्दे से ढंका रहता था और वहां मशालों से रोशनी होती थी। मेरे किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते नाटक कंपनियों का आना बंद हो चुका था और पारंपरिक यक्षगान का आकर्षण मुझे खींचता था। अब मैं एक बड़े शहर में आ गया था, जहां कॉलेज थे और बिजली भी थी, लेकिन थियेटर नहीं था। मैं कवि बनना चाहता था, किन्तु जल्दी ही मुझे एहसास हुआ कि मेरी नियति में नाटककार बनना लिखा है। मुझे इंग्लैंड जाना था। मैं जिस मानसिक स्थिति में था, उसके बीच मुझे कविता लिखनी चाहिए थी। मैं बचपन से कविता लिखता था और पश्चिमी दुनिया से मान्यता हासिल करने के लिए अंग्रेजी में लिखता था। किन्तु मैं नाटक लिख रहा था, और वह भी कन्नड़ में, जो मेरे बचपन की भाषा थी। उस नाटक की थीम प्राचीन भारतीय मिथक से ली गई थी। मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं थी, क्योंकि प्राचीन भारतीय परंपरा के ज्ञान के मामले में मैं खुद को फिसड्डी समझता था। पर नियति तो कुछ और ही रही। बाद में नाटक, फिल्म पटकथा, निर्देशन, अभिनय सब कुछ होता चला गया।'
दमन के खिलाफ बने संघर्ष की आवाज
जीवन के आखिरी दशक में कर्नाड की पहचान दमन के खिलाफ संघर्ष की आवाज बनने वाले शख्सियत के रूप में हुई। पिछले पांच-सात वर्ष के दौरान उन्होंने मानवाधिकारों, असहिष्णुणता, गौरी लंकेश की हत्या सहित बुद्धिजीवियों पर हो रहे हमले, समाज में वैमनष्यता फैलाने वाले संगठनों आदि के खिलाफ मुखर होकर आवाज बुलंद की। बहुलता, विविधता और स्वतंत्रता के लिए वे लगातार संघर्ष करते रहे, जिस कारण हाल के वर्षों में वे सत्तारूढ़ों के निशाने पर भी आए। इसके अतिरिक्त कुछ साल पहले उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर को दोयम दर्जे का नाटककार बताकर एक विवाद भी पैदा कर दिया था।
Published on:
10 Jun 2019 10:56 pm
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