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कई मामलों में केंद्र पर हावी राज्य राजनीति

षेत्रीय व राष्ट्रीय पार्टियों के बीच टकराव के कारण केंद्र और राज्य के संबंध खराब होते हैं
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बैंगलोर

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Ram Naresh Gautam

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Updated: 30 Aug 2018, 4:53 PM IST

sangoshthi

कई मामलों में केंद्र पर हावी राज्य राजनीति

बेंगलूरु. बेंगलूरु विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी लॉ कॉलेज (यूएलसी) ने बुधवार को 'केंद्र-राज्य संबंधÓ विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया। जैन विवि के प्रो चांसलर प्रो. संदीप शास्त्री ने कहा कि भारतीय एकता व अखंडता के लिए केंद्र को राज्य से अधिक शक्तिशाली बनाया गया है।
लेकिन राज्यों की राजनीति अब क्षेत्रीय सीमाओं को लांघ केंद्रीय राजनीति को प्रभावित ही नहीं कर रही है, बल्कि कई मामलों में केंद्र पर हावी भी हो रही है। क्षेत्रीय व राष्ट्रीय पार्टियों के बीच टकराव के कारण केंद्र और राज्य के संबंध खराब होते हैं। यदि राज्य केंद्र के निर्देशों का पालन नहीं करता तो केंद्र अनुच्छेद 356 का प्रयोग कर राष्ट्रपति शासन लगा सकता है।

राज्य का प्रशासन अपने हाथों में ले सकता है। लेकिन बहु-पार्टी प्रणाली और सशक्त क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों के कारण अब यह उतना आसान नहीं है। हालांकि संघीय संरचना में राज्यों का अधिक महत्व है। लेकिन राज्य और केंद्र के बीच वित्तीय संबंधों की बात करें तो कभी-कभी अनुदान व फंड आदि जारी करने के मामलों में केंद्र तानाशाही रवैया अपनाता है। आने वाले समय में केंद्र और राज्य के संबंधों में व्यापक बदलाव देखने को मिलेंगे। यूएलसी के डीन प्रो. वी.सुदेश सहित एलएजबी और एलएलएम के कई विद्यार्थी ने व्याख्यान में हिस्सा लिया।

प्लास्टिक प्रतिबंध पर पुनर्विचार का अनुरोध
बेंगलूरु. कर्नाटक चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्री फेडरेशन के अघ्यक्ष सुधाकर एस शेट्टी ने बुधवार को राज्यसरकार से प्लास्टिक के उपयोग पर लगाए गए प्रतिबंध पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है। बयान जारी कर उन्होंने कहा कि राज्य में प्लास्टिक पर प्रतिबंध प्रदूषण के खिलाफ प्रतिगामी कदम साबित होगा। अनुमानत: इससे प्लास्टिक उद्योग को पांच सौ करोड़ रुपए का नुकसान होगा। इस उद्याोग को बचाना मुश्किल हो जाएगा। कई उद्योगपतियों ने प्लांट और मशीनरी में करोड़ों का निवेश किया है।

उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा। हालांकि, इको-कार्यकर्ताओं ने प्लास्टिक उद्योग के प्रदूषण के खिलाफ अभियान का स्वागत किया है, लेकिन प्लास्टिक उद्योग के लिए यह आत्माघाती कदम होगा। कर्नाटक में पचास हजार करोड़ रुपए की प्लास्टिक का उत्पादन होता है। इसमें से साठ फीसदी का पुनर्चक्रण होता है और 95 फीसदी से पॉलीथिलिन थेरफथलेट की बोतलें बनती हैं।