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रखरखाव के अभाव में खंडहर बनता ‘बालभवन’

यह चल रही है लेकिन इसके मार्ग पर सफाई तथा अन्य सुविधाओं की अनदेखी की जा रही है

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रखरखाव के अभाव में खंडहर बनता 'बालभवन'

बेंगलूरु. कब्बन पार्क स्थित 'बालभवन' तथा चामराजपेट स्थित 'मक्कल कुटा' की अनदेखी से ये खंडहर बनते जा रहे हैं। जवाहर लाल बालभवन में बच्चों के मनोरंजन के लिए स्थापित झूले, खेल के अन्य उपकरण तथा टॉय ट्रेन धूल फांक रहे हैं। कब्बन पार्क में स्थित बालभवन के परिसर का चक्कर लगाने वाली टॉय ट्रेन बच्चों के आकर्षण का केंद्र होती थी। यह चल रही है लेकिन इसके मार्ग पर सफाई तथा अन्य सुविधाओं की अनदेखी की जा रही है। पटरी पर कचरा फैल रहा है और यहां पर लगाए गए अधिकतर झूले बंद पड़े हैं। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अब बच्चे बालभवन से दूर हैं।

बालभवन में प्रतिवर्ष बच्चों की चित्रकला समेत अन्य प्रतियोगिताओं का आयोजन होता था लेकिन अब ऐसी प्रतियोगिताएं नहीं हो रही। अब केवल 14 नवंबर को बाल दिवस के नाम पर रस्म अदायगी की जा रही है। बालभवन के सभागार में बच्चों के लिए नाटक तथा फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता था लेकिन अब वहां ताला लग चुका है। बच्चों के लिए बोटिंग की सुविधा है लेकिन पानी की सफाई नहीं होने से वहां बदबू फैली रहती है।

मक्कल कुटा में सन्नाटा
उधर, चामराजपेट में वर्ष 1938 में समाजसेवी आर.कल्लाणम्मा की ओर से स्थापित ऑल इंडिया चिल्ड्रन एसोसिएशन (मक्कल कुटा) में भी ऐसे ही हालांत है। यहां के उपकरणों की कई वर्ष से मरम्मत नहीं किए जाने से बच्चे इन उपकरणों का उपयोग नहीं कर रहे हैं। पहले यहां हर शनिवार तथा रविवार को बच्चों के लिए शिविर लगते थे लेकिन अब इनका आयोजन भी नहीं हो रहा है। दोनों स्थानों पर अब सन्नाटा व्याप्त है। केवल गर्मियों की छुट्टियों में ही शिविरों का आयोजन होता है।

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मैसूरु में एआइआइएसएच में नए शोध केंद्र अगले माह से
137 करोड़ रुपए हो रहे हैं खर्च, 68 नए पद सृजित
बहरेपन के पीडि़त लोगों को मिलेगा लाभ
मैसूरु. ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग (एआइआइएसएच) परिसर में नवस्थापित शोध केंद्र अगले माह सितंबर में काम शुरू कर देंगे। अब तक भवन संबंधी करीब 94 प्रतिशत कार्य पूर्ण हो चुका है। बुनियादी ढांचे को अपग्रेड किया जा रहा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से 68 पद शोध संस्थान के लिए सृजित किए गए हैं।

एआइआइएसएच की निदेशक डॉ. एस.आर. सावित्री ने बताया कि 52 वर्ष पुराने विश्व स्तरीय शोध संस्थान पर 137 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि यहां देश भर सभी आयु वर्ग के लोगों का उपचार किया जा सकेगा। इस संस्थान में सेंटर फॉर स्पीच एंड लैंग्वेज साइंसेज, सेंटर फॉर हियरिंग साइंसेज, संचार विकारों के रोकथाम केंद्र और संचार विकारों में महामारी विज्ञान अनुसंधान और संज्ञानात्मक व्यवहार विज्ञान, सेंटर फॉर इंफॉर्मेटिक्स एंड पेटेंट्स एंड रिहैबिलिटेशन इंजीनियरिंग, ध्वनि, और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और संचार विकारों में सार्वजनिक शिक्षा पर शोध किया जाएगा। डॉ. सावित्री ने कहा कि बच्चों, वयस्कों और वरिष्ठ नागरिकों में श्रवण हानि, टिनिटस और वेस्टिबुलर विकार, सेंटर फॉर ऑगमेंशेटिव एंड अल्टरनेटिव कम्युनिकेशन, और साइन लैंग्वेज और संचार विकारों की शल्य चिकित्सा के लिए पांच केंद्र शुरू किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के कानपुर और त्रिपुरा में उत्तर और पूर्वोत्तर के लोगों के उपचार के लिए एआइआइएसएच की तर्ज पर शाखा खोलने का प्रस्ताव दिया है। यह संस्थान ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की तर्ज पर है।