8 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

जीव को ना दु:ख चाहिए ना दुर्गति-आचार्य अरविन्दसागर

धर्मसभा का आयोजन

less than 1 minute read
Google source verification
जीव को ना दु:ख चाहिए ना दुर्गति-आचार्य अरविन्दसागर

जीव को ना दु:ख चाहिए ना दुर्गति-आचार्य अरविन्दसागर

बेंगलूरु. तीर्थंकर भगवंतों ने धर्मतीर्थ की स्थापना कर उस आलम्बन से जीव को अनादिकालीन अज्ञान की दशा को मिटाने के लिए ज्ञान दिया। अज्ञानता की दशा आत्मा को स्वभाव से दूर करते हुए विभाव की ओर ले जाती है अनुचित बातों से जोड़ती है। लेकिन परमात्मा बचने का आलम्बन देते हैं और ज्ञानदशा से जोडक़र हमें स्वयं के स्वरूप का परिचय करवाते है, दुष्ट आलंबनों से बचने की कोशिश करवाते हैं। जीव को ना दु:ख चाहिए ना दुर्गति, पर केवल विचार करने से या इच्छा से दु:ख या दुर्गति टलती नही है, जीव को इसके पीछे का कारण जानना चाहिए तभी इसे रोक पाएगा,इससे छुटकारा पाएगा। यह अज्ञानता कि अवस्था जिसमें हम निरंतर रहते है इसी का ध्यान लगाते है ज्ञान पाने की उत्सुकता भी नही दिखाते इस अज्ञान ध्यान से बचना है। भगवान महावीर कहते हैं कि जिसने एक को जान लिया उसने सबको जान लिया वह एक है-हमारी आत्मा। तीन प्रकार के आनंद में गुण आनंद श्रेष्ठ है बाकी दो कषाय आनंद व पदार्थ आनंद तो आत्मा से परे दु:ख देने वाले होते हैं। यह बात गणिवर्य हीरपद्मसागर ने आज के दैनिक प्रवचन में कही। संसार के भौतिक सुख पदार्थ है हम इन्हें पाने के लिए छल, कपट, क्रोध, लोभ और मान करते है। हम परमात्मा की प्रतिमा भी निहारते हुए पदार्थ आनंद पाते हैं जबकि हमें उनकी गुण दशा देखनी है यदि हमारे में लोभ है तो हम संतोष देखे और क्रोध है तो क्षमा। हमें हमारा आत्म दर्शन करना है फिर तो हमें परमात्मा की छवि भी सुंदर लगेगी। स्वयं की आत्मा के देव दर्शन हमें परमात्मा की छवि में देखने है यही गुण आनंद हमारे में करुणा भाव लाएगा। चित्त को प्रसन्नता मिलेगी।