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मानसिक स्वास्थ्य ‘साइड इश्यू’ नहीं, ‘लाइफ इश्यू’ है: हेब्बालकर

कई मुस्कानों के पीछे तनाव छिपा होता है। कई मजबूत महिलाएं अनदेखी लड़ाइयां लड़ रही होती हैं। चुपचाप झेली जा रही परेशानियां भी वास्तविक होती हैं। एक छोटी बच्ची पर पढ़ाई का दबाव हो, नौकरी और घर की जिम्मेदारी निभा रही महिला हो, जीवन के बदलावों से गुजर रही मां हो या अकेलेपन का सामना […]

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मानसिक स्वास्थ्य

महिला एवं बाल विकास, दिव्यांग एवं वरिष्ठ नागरिक सशक्तिकरण मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर

कई मुस्कानों के पीछे तनाव छिपा होता है। कई मजबूत महिलाएं अनदेखी लड़ाइयां लड़ रही होती हैं। चुपचाप झेली जा रही परेशानियां भी वास्तविक होती हैं। एक छोटी बच्ची पर पढ़ाई का दबाव हो, नौकरी और घर की जिम्मेदारी निभा रही महिला हो, जीवन के बदलावों से गुजर रही मां हो या अकेलेपन का सामना कर रही बुजुर्ग महिला हो, हर चरण नई चुनौतियां लेकर आता है। मानसिक स्वास्थ्य कोई 'साइड इश्यू' नहीं बल्कि 'लाइफ' इश्यू है।

हर वर्ग को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी

ये बातें महिला एवं बाल विकास, दिव्यांग एवं वरिष्ठ नागरिक सशक्तिकरण मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर ने कही। वे शहर में आयोजित एमपावरिंग माइंड्स विमेन्स मेंटल हेल्थ समिट को संबोधित कर रही थीं। मंत्री ने एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि कर्नाटक में हजारों महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही हैं। कोई एक संस्था इस समस्या का समाधान नहीं कर सकती। सरकार सहित समाज के हर वर्ग को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी। ऐसा माहौल बनाना जहां महिलाएं सुरक्षित, समर्थित और सम्मानित महसूस करें।

यदि बेटी का जन्म बेटे से पहले होता है तो...

उन्होंने यह भी कहा कि कई घरों में यदि बेटी Daughter का जन्म बेटे Son से पहले होता है तो वह छोटी उम्र में ही मातृ भूमिका निभाने लगती है। आगे चलकर गर्भावस्था से लेकर रजोनिवृत्ति के बाद तक महिलाओं को कई हार्मोनल बदलावों से गुजरना पड़ता है, लेकिन वे अक्सर इन मुद्दों पर खुलकर बात नहीं कर पातीं।शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़े मानसिक स्वास्थ्य

मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के साथ जोडऩा बेहद जरूरी

राष्ट्रीय मानसिक आरोग्य व स्नायु विज्ञान संस्थान (निम्हांस) कि निदेशक, डॉ. प्रतिमा मूर्ति ने कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए मानसिक स्वास्थ्य Mental Health को शारीरिक स्वास्थ्य के साथ जोडऩा बेहद जरूरी है। महिलाएं जन्म से लेकर किशोरावस्था और मातृत्व तक हर चरण में चुनौतियों का सामना करती हैं। उनके सशक्तिकरण के लिए समाज में उनकी भूमिका को स्वीकारना और सम्मान देना आवश्यक है।