
मैसूरु. मुंडक उपनिषद का मूल मंत्र सत्यमेव जयते भारतीय संस्कृति का प्राण है और यही सारे रीति-रिवाजों, परम्पराओं, उत्सवों को अनुप्राणित करता है। दशहरा पर्व इसी संस्कृति का चरमोत्कर्ष है। असत्य पर सत्य की जीत, बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है दशहरा। बात मैसूरु दशहरा की हो तो यह अपने अनूठे अंदाज के कारण और भी खास हो जाता है क्योंकि यहां बुराई का प्रतीक रावण नहीं, बल्कि महिषासुर है, जिसका वध मां दुर्गा ने किया था। मैसूरु का दशहरा देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरा से एक और कारण से अलग है। देश के कई हिस्सों में दशहरा केवल एक दिन के लिए मनाया जाता है लेकिन मैसूर में यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है। मैसूरु दशहरा महोत्सव इतिहास, संस्कृति और परंपरा का मिश्रण है।
मैसूरु दशहरा महोत्सव की खास बात यह भी है कि यह लोक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। सदियों पुराने इस उत्सव को हर युग में राज्याश्रय मिला। इसके अंतर्गत खेलकूद से जुड़े आयोजन होते हैं, संगीत की स्वरलहरियां हवाओं में तैरती हैं, सभागारों में कलाकार नृत्य की बानगी पेश करते हैं और फूड फेस्टिवल में मैसूरु पाक सहित कर्नाटक के ढेर सारे मिष्ठान्न मिल बांटकर खाए जाते हैं। इसके साथ ही राज्य के सांस्कृतिक वैभव की झलक पेश करती प्रदर्शनियों का आयोजन होता है।
राजघरानों से जुड़ाव
मैसूरु दशहरा महोत्सव आज भी मैसूरु राजघराने के वंशजों की मौजूदगी में मनाया जाता है जो इस बात का प्रतीक है कि समय के साथ राजे-रजवाड़ों का समय भले ही बीत चुका हो लेकिन वर्तमान समय अतीत के पन्नों में लिखे गए उनके स्वर्णिम योगदान को भूला नहीं है। अपने अतीत पर गर्व से माथा उठाए मैसूरु का पैलेस, जिसे अम्बा विलास पैलेस भी कहा जाता है आज भी पर्यटकों, कलाप्रेमियों का स्वागत करता है। दशहरा महोत्सव हो तो रोशनी और सजावट के बाद इसका सौंदर्य और भी निखर उठता है। बेजोड़ वास्तुकला, शिल्पकारी और नक्काशी पर इठलाते हुए पैलेस की आभा को एक लाख से अधिक बल्ब कई गुणा बढ़ा देते हैं।
विजयनगर साम्राज्य से जुड़ी हैं जड़ें
मैसूर दशहरा उत्सव की जड़ें अतीत में विजयनगर साम्राज्य से जुड़ी हैं। बताया जाता है कि शुरुआत में यह आध्यात्मिक आयोजन था जिसे जन जुड़ाव को देखते हुए कालांतर में सांस्कृतिक रूप दिया गया। इतिहासकारों के अनुसार सन् 1136 से 1565 ई. तक विजयनगर के राजाओं ने कला और संस्कृति के महत्व को पहचानते हुए इस उत्सव को शाही संरक्षण प्रदान किया। शाही समर्थन की वजह से दशहरा एक विशुद्ध धार्मिक आयोजन के दायरे से बाहर निकलकर राज्य की कला, संस्कृति और विरासत का एक भव्य उत्सव बनता गया।
वाडियार युग में परवान चढ़ी परम्परा
कभी विजयनगर साम्राज्य के अधीन रहे मैसूर के वाडियार राजाओं ने 16वीं शताब्दी के अंत में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। उन्होंने दशहरा परंपराओं का सम्मान करना जारी रखा। उनके शासन के तहत पहला भव्य उत्सव 1610 में श्रीरंगपट्टण में हुआ था। उस समय वही मैसूरु की राजधानी थी। श्रीरंगपट्टण का दशहरा महोत्सव एम. कृष्णराज वाडियार के नेतृत्व में मनाया गया था, जो उस समय केवल पांच वर्ष के थे। इस घटना का उल्लेख वाडियार की ओर से प्रकाशित पुस्तक श्री मनमहाराजरावर वंशावली में है।
बाद में हैदर अली और टीपू सुल्तान के समय में भी दशहरा लोक उत्सव की तरह मनाया जाता रहा।
इतिहासकारों के अनुसार नलवाड़ी कृष्णराज वाडियार चतुर्थ के शासनकाल के दौरान यह उत्सव भव्यता की बुलंदियों पर पहुंच गया। एक सुनहरी गाड़ी में सजे हुए हाथी पर राजा के साथ जुलूस, मैसूरु दशहरा का प्रतीक बन गया। हालांकि आजादी के बाद इस लोकोत्सव की भव्यता थोड़ी कम हुई लेकिन कुछ वर्षों बाद ही इसने अपनी महिमा फिर से हासिल कर ली। कोरोना के दौरान दशहरा का रंग फीका पड़ा लेकिन अब यह पुराने वैभव में लौट आया है।
राजा का स्नान
आजादी के बाद मैसूरु दशहरा का अंदाज बदल गया मगर परंपराएं वैसी हैँ। सरकारी आयोजन नाड हब्बा के तौर पर होता है और पूर्व शाही परिवार के उत्तराधिकारी परंपरागत तरीके से महल में अनुष्ठान करते हैं। दशहरे के दौरान महल के दरबार हॉल में वाडियार राजवंश की विरासत का प्रतीक स्वर्ण सिंहासन अपनी पूरी भव्यता के साथ प्रदर्शित किया जाता है। वाडियार परिवार के उत्तराधिकारी का सांकेतिक निजी दरबार भी पुराने शाही अंदाज में लगता है।
जंबो सवारी आकर्षण का केंद्र
महोत्सव के प्रत्येक दिन, महल देवी चामुंडेश्वरी को समर्पित मधुर मंत्रों और भजनों से गूंजता है, जिससे भक्ति का एक अलौकिक वातावरण बनता है। रात होते ही महल की सजावट आकाश के नीचे चमकते हुए एक रत्न का रूप देती है। हर तोरणद्वार, हर गलियारा, और महल का हर बुर्ज सुनहरी चमक से नहा उठता है। आसपास के पानी में रोशनी का प्रतिबिंब इसकी अलौकिक सुंदरता चार चांद लगा देता है। रोशनी से जगमगाते महल की भव्यता पर्यटकों को नयनाभिराम सुख देती है।
दशहरा उत्सव का चरमोत्कर्ष विजयादशमी के दिन होता है जब जंबो सवारी के रूप में हाथियों का जुलूस निकलता है। मुख्य हाथी की पीठ पर एक विशाल स्वर्ण हौदे में मां चामुंडेश्वरी की प्रतिमा सुशोभित होती है। यह एक भव्य परेड होती है जिसमें मैसूरु की शानदार विरासत को बेहद खूबसूरती से दर्शाया जाता है। बन्नी मंटप का का नाम शहर के बाहरी इलाके में स्थित बन्नी (शमी) पेड़ के नाम पर रखा गया था। पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अपने हथियार बन्नी के पेड़ में छुपाए थे। युद्ध शुरू करने से पहले राजा जीत की कामना के लिए इस पेड़ की पूजा करते थे। बन्नी मंडप में टार्च लाइट परेड दशहरा उत्सव का एक मुख्य आकर्षण होती है।
Published on:
15 Oct 2023 02:32 pm
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