
परमात्मा की उपेक्षा कभी न करें
मैसूरु. समुतिनाथ जैन संघ मैसूरु के महावीर भवन में जैनाचार्य विजय रत्नसेन ने कहा कि जो व्यक्ति परमात्मा की भावपूर्वक पुष्पों से पूजा करता है उसे त्रिजमत के पूज्य स्थान रूप सिद्धि पद की प्राप्त होती है। जो व्यक्ति परमात्मा की उपेक्षा करता है उसे सारे जगत में उपेक्षा, अनादर एवं अपमान की प्राप्ति होती है। जिसके अन्र्तमन में परमात्मा के प्रति प्रीति और भक्ति का भाव हो उसे ही परमात्मा को सजाने और संवारने का मन होता है।
दुनिया में जो कोई भी सुंदर वस्तु दिखती है, उससे हम अपने आप को अथवा अपने प्रियतम को सजाने की भावना रखते हैं परन्तु कुछ विरले ही होते हैं जो प्राप्त हुई सुन्दर सामग्री से परमात्मा को सजाते हैं। उन्होंने कहा कि 900 वर्ष पूर्व कुमारपाल ने पूर्व भव में 18 पुष्पों से भाव विभोर होकर परमात्मा की पूजा की थी, जिससे उसे 18 देशों का साम्राज्य प्राप्त हुआ था।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक श्रावक को प्रतिदिन परमात्मा के दर्शन किए बिना मुंह में पानी भी नहीं डालना चाहिए। अष्ट प्रकारी पूजा किए बिना मध्याह्न का भोजन नहीं करना चाहिए। जो श्रावक नकार महामंत्र के साथ सावा लाख पुष्पों से भक्ति करता है उसे तीर्थंकर, चक्रवती, इन्द्र आदि की पदवियों एवं शाश्वत सुख मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रवचन के बाद बाबूलाल मुणोत ने आगामी कार्यक्रम की जानकारी दी।
महावीर के विचारों के लिए उनका अनुगमन जरूरी
चामराजनगर. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ गुंडलपेट के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में साध्वी साक्षी ज्योति ने कहा कि परमात्मा आत्मा से भिन्न नहीं होता। आत्मा ही क्रमश: विकसित होती हुई परमात्मा बन जाती है। जिस आत्मा के मन, वचन और कर्म एक रूप बन जाते हैं। वह आत्मा महात्मा है तथा जिसके मन, वचन और कर्म सर्वथा समाप्त हो जाते हैं व परमात्मा है।
प्रत्येक आत्मा की सर्वोच्च अर्हता का स्वीकार भगवान महावीर की एक अनुपम देन है। भगवान की मुक्ति हो गई है पर उनके विचारों की कमी मुक्ति नहीं हो सकती। आज कठिनाई यह हो रही है कि भगवान महावीर का भक्त उनकी पूजा करता है परन्तु उनके विचारों का अनुगमन करना नहीं चाहता है। उन विचारों के अनुसार तपना और खपना नहीं चाहता। मंच संचालन आनन्द गन्ना ने किया।
Published on:
30 Sept 2018 05:38 pm
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