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सरल बने बिना सत्य की उपासना नहीं

धर्मसभा: भाव के आधार पर ही फल खट्टे-मीठे और कड़वे होते हैं

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सरल बने बिना सत्य की उपासना नहीं

बेंगलूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में गोडवाड़ भवन में उपाध्याय रविंद्र मुनि के सान्निध्य में रमणीक मुनि ने कहा कि मेरी भाव रचना शब्दों का गठजोड़ है। इसमें आत्मा के दर्शन हो सकते हैं, इसके शब्दों की आत्मा हम तभी अनुभव कर सकते हैं, जब हम अपने भावों को इस रचना से जोड़कर चलेंगे।

उन्होंने कहा कि संत कैसे थे? श्रावक कैसे बन सकते हैं? यह सब मेरी भावना से पता चल सकता है। वे मेरी भावना रूपी आईना दूसरों को ही नहीं दिखाते बल्कि स्वयं भी देखते हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में विनम्रता जरूरी है। रमणीक मुनि ने शरीर को वृक्ष बताते हुए कहा कि इस पर लगने वाले फल कड़वे या मीठे, उन्हें भाव कहते हैं। भाव के आधार पर ही फल खट्टे-मीठे और कड़वे होते हैं। जो सरल है वह सत्य होगा, उसमें कपट, दिखावा अथवा ढोंग नहीं होगा।

यह सरलता ही सत्य कहलाती है, सरल बने बिना सत्य की उपासना भी नहीं की जा सकती। सरल बनने पर ही सत्य के नजदीक पहुंचा जा सकता है। प्रारंभ में उपाध्याय रविंद्र मुनि ने मंगलाचरण किया। ऋषि मुनि ने गीतिका सुनाई। पारस मुनि ने मांगलिक प्रदान की। चिकपेट शाखा के महामंत्री गौतमचंद धारीवाल ने श्रमण संघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषि के जन्मोत्सव प्रसंग पर विचार व्यक्त किए।


सदा मुस्कराते रहो
बेंगलूरु. साध्वी प्रियरंजनाश्री ने कहा कि जीवन में दुख के बाद सुख, गति के बाद ठहराव, सोने के बाद जागरण, रोने के बाद मुस्कुराना आते ही हैं। ऐसा जीवन जियो, जिससे स्व पर दोनों का जीवन फूलों की तरह महक जाए। उन्होंने कहा कि हर हालत में खुश रहो, मुस्कराते रहो। परमात्मा ने हमें इतना कुछ दिया बिना मेहनत, बिना योजना, बिना मांगे तो फिर प्रभु को धन्यवाद दें, जो नहीं मिला उसकी शिकायत नहीं करें। धन्यवाद देने के हजारों मौके उपस्थित होते हैं, परंतु दिल मानता नहीं है। हमारा मन अच्छाइयों की प्रशंसा करने में लाख बार विचार करता है, जबकि बुराई की निंदा करनी हो तो एक बार भी सोचना नहीं है।