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श्रावक को गंभीर बनना चाहिए

वैसे ही अच्छे श्रावक माता-पिता के समान साधु-साध्वीवृंद को हर प्रकार से उनके संयम पालन जीवनचर्या में सुख-साता पहुंचाने का कार्य करते हैं

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श्रावक को गंभीर बनना चाहिए

बेंगलूरु. हनुमंतनगर जैन स्थानक में साध्वी सुप्रिया ने स्थानांग सूत्र में चार प्रकार के श्रावकों का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि माता-पिता के समान जो श्रमणों, संत चारित्र आत्माओं की सेवा भक्ति करते हैं, उनके संयम पालन में सहयोगी बनते हैं। उन्हें धर्म साधना में हर प्रकार से सुख साता पहुंचाते हैं वो आदर्श श्रेणी के श्रमणोपासक श्रावक होते हैं।

उन्होंने कहा कि जैसे माता-पिता अपनी संतान का हर प्र्रकार से लालन-पालन करते हैं। संतान को कैसे सुख पहुंचे इसका भली प्रकार से ख्याल रखते हैं। वैसे ही अच्छे श्रावक माता-पिता के समान साधु-साध्वीवृंद को हर प्रकार से उनके संयम पालन जीवनचर्या में सुख-साता पहुंचाने का कार्य करते हैं। दूसरे श्रावक मित्र के समान होते हैं।

जिनशासन पर कभी विपदा आ जाए तो वो सदा संघ समाज का साथ देते हैं, जो किसी के सुख-दुख में हर प्रकार से सहयोग करते हैं वही सच्चे श्रावक कहलाने के अधिकारी हैं। साध्वी सुमित्रा ने सागर चरित्र का वाचन किया। साध्वी सुविधि ने भजन प्रस्तुत किया। संचालन सहमंत्री रोशनलाल बाफना ने किया। संघ अध्यक्ष हुकमीचंद कांकरिया ने 33 उपवास के मौन तपस्या गतिमान है। संघ मंत्री महावीर चंद धारीवाल ने स्वागत किया।


वंदन के पहले त्याग से लगाव करें
बेंगलूरु. जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ शांतिनगर में आचार्य महेंद्र सागर सूरी ने कहा कि वंद से ज्ञानादि गणधारक गुरुदेव की भक्ति होती है। गुरुवंदन से नीच गोत्र कर्म नाश होता है। उच्च गोत्र कर्म बंधता है और कर्मों की ग्रंथियां ढीली होती है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण-वासुदेव ने वचन से तीर्थंकर नाम कर्म बांधा, क्षयिक समकित पाया और दुर्गति में ले जाता कर्म कम को कम किया। हमारे जीवन पर त्यागियों का बहुत ही प्रभाव होता है। वंदन के लिए सबसे पहले त्याग के प्रति लगाव होना चाहिए। त्याग के लगाव के अभाव में और बगैर विनयगुण के वंदन नहीं हो सकता है। अक्कड़ रहने से नहीं, अपितु नम्र रहने से ही व्यक्ति की गरिमा बढ़ती है।