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शौक-ए-सफर में मैं देखती नहीं पांव के छाले… पूजा बजाज

जानलेवा दुर्घटना के 26 दिन बाद ही फिर फर्राटे से बाइक दौड़ा रही सोलो राइडर पूजा

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शौक-ए-सफर में मैं देखती नहीं पांव के छाले... पूजा बजाज

Solo Rider Pooja Bajaj

प्रियदर्शन शर्मा
बेंगलूरु. मां को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए पिता को बिना बताए ही आठवीं कक्षा में पढ़ते हुए स्कूटर सीखना और फिर पड़ोसियों की बाइक मांगकर पंद्रह साल की उम्र में बाइक दौड़ाने वाली पूजा बजाज के जीवन में ऐसी कई कहानियां हैं, जो चुनौतियों पर हौसले की जीत का जीवंत उदाहरण हैं।

जब इसी वर्ष जून में हिमाचल प्रदेश के स्पीति घाटी में बाइक दुर्घटना में पूजा गंभीर रूप से घायल हो गई तब उपचार के लिए बेंगलूरु पहुंचने में उसे छह दिन लग गए। दाएं कंधे के पास मल्टीपल फ्रैक्चर से जूझ रही पूजा की सर्जरी हुई तो कंधों में रॉड डाला गया। लेकिन, यह पीड़ा भी पूजा के जज्बे पर भारी नहीं पड़ी और अस्पताल में उसका पहला सवाल यही था कि वह फिर से बाइक कब चला पाएगी। अंतत: २६ वें दिन फिर से पूजा अपने शौक-ए-सफर को पूरा करने बाइक पर सवार हो गई।

सोलो राइडर यानी अकेले ही लंबी लंबी यात्राओं को पूरा करने वाली बाइकर पूजा के हौसले के आगे चुनौतियां मुश्किल नहीं बन पाई। पिछले एक दशक में एक लाख किलोमीटर से ज्यादा बाइक दौड़ा चुकी पूजा ने देश की कई कठिन चढ़ाइयां फतह की हैं। ‘पत्रिका’ से बात करते हुए पूजा ने बताया कि स्पीति घाटी में वह 12 दिनों के ट्रिप पर थी लेकिन 10वें दिन वह दुर्घटना का शिकार हो गई। वहां से पूर्ण सुविधा युक्त सबसे नजदीकी अस्पताल चंडीगढ़ में था लेकिन खराब मौसम, भूस्खलन और अन्य बाधाओं के कारण वहां पहुंचने में भी 48 घंटों का समय लग रहा था। हालांकि, वह असहय पीड़ा को झेलते हुए पहले चंडीगढ़ और फिर छठे दिन बेंगलूरु पहुंची।

पूजा ने बताया कि गंभीर दुर्घटना के बाद उसके मन में एक ही सवाल था कि क्या वह दोबार बाइक चला पाएगी। यहां तक कि परिवार के सदस्यों ने भी पूजा की गंभीर हालत को देखते हुए उसे बाइक छोडऩे का सुझाव दिया। लेकिन, उसने 26 वें दिन ही फिर से खुद को बाइक चलाने के लिए तैयार कर लिया और उसका यह जज्बा अब दूसरों के लिए प्रेरणा बन चुका है कि मुश्किल परिस्थिति में हार नहीं मानना चाहिए।

सेना में जाने का था सपना
लखनऊ में पली-बढ़ी रेलवे कर्मचारी पिता की बेटी पूजा का सपना था कि वह सेना में जाए लेकिन परिवार ने मना किया तो बाइक चलाने के शौक को जुनून में बदला, जो अब पेशेवर राइडर का रूप ले चुका है। सोलो राइडिंग को सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं मानने वाली पूजा का कहना है कि लड़कियां किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं। वह चाहती है कि अन्य लड़कियां भी अपने सपनों को पूरा करे और इसके लिए मजबूद इरादे रखे। महिला सुरक्षा के लिए महिलाओं को डर पर जीत हासिल करने का सुझाव देते हुए पूजा कहती हैं कि सोलो राइडिंग के दौरान उनके समक्ष भी ये चुनौती रहती है।

हालांकि, एनसीसी के सी प्रमाणपत्र धारक और मार्शल आर्ट, बॉक्सिंग जैसी हुनर जानने वाली पूजा अपनी सुरक्षा के लिए चाकू और पीपर स्प्रे भी साथ लेकर चलती है। पूर्वाेत्तर भारत और हिमालय के कई घाटियों में बाइक चला चुकी पूजा भले फ्रैक्चर का शिकार हुई हो लेकिन अब उसके सपने में बेंगलूरु से लंदन या और लंबी यात्रा बाइक से करना है।