मंदिर परिसर में बड़ी-बड़ी एलसीडी स्क्रीन लगाई गई थीं। कहा जाता है कि बेंगलूरु के संस्थापक केंपेगौड़ा ने नवीं सदी में इस मंदिर का निर्माण प्राकृतिक गुफा में करवाया था। 16 वीं सदी में केंपेगौड़ा राजवंश ने ही मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। उस समय शिल्पकला में निपुण कारीगरों ने मंदिर की वास्तु रचना इस तरीके से बनाई कि मकर संक्राति पर शाम को एक गवाक्ष (खिड़की) से होकर मंदिर में प्रवेश करने वाली सूरज की किरणें शिवलिंग के सामने स्थित नंदी के सींगों के बीच से गुजर कर शिवलिंग तक पहुंचती हैं।
मंदिर में गवि गंगाधरेश्वर (शिवलिंग) के अलावा यहां गणेश, सप्त माता तथा दो सिर, आठ हाथ वाले अग्निमुर्ति, नाग देवताओं की प्रतिमाएं हैं। इसके अलावा यहां एक शिला में स्थापित शिवजी का त्रिशुल तथा डमरु भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
उमड़ा श्रद्धालुओं का हुजूम
मकर संक्राति पर बसवनगुड़ी, चामराजपेट, नगरथपेट, चिकपेट, महालक्ष्मी ले आउट, विजयनगर, जयनगर, यशवंतपुर समेत विभिन्न मंदिरों में विशेष पूजा अनुुष्ठान का आयोजन किया गया। जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस अवसर पर यल्लू-बेल्ला (गुड़-तिल) का आदान प्रदान किया गया।