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अशुभ से शुभ भावों की ओर ले जाती है जिनवाणी

मलिन भावना, विशुद्ध आत्मा में कर्म के मिल जाने से आत्मा की गुणवत्ता में कमी आ जाती है।

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jaimal

अशुभ से शुभ भावों की ओर ले जाती है जिनवाणी

बेंगलूरु. जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में जय परिसर स्थित महावीर धर्मशाला में बारह भावना की प्रवचन शृंखला के तहत एकत्व भावना पर पर विचार व्यक्त करते हुए जय धुरंधरमुनि ने कहा कि प्रभु महावीर की वाणी साधक को अशुभ से शुभ भावों की ओर ले जाती है।

सूक्षमता से किया हुआ गहन चिंतन ही भावना है। भावना के दो भेद होते हैं। प्रथम तो वो शुद्ध भाव, जहां ज्ञान, दर्र्शन वो चरित्र वैराग्य आदि से युक्त होती है आत्मा तथा दूसरी वो मलिन भावना, विशुद्ध आत्मा में कर्म के मिल जाने से आत्मा की गुणवत्ता में कमी आ जाती है।

यह भावना बाहर से हटकर भीतर की ओर ले जाती है। साधक को अंतर्मुखी बनाती है। उत्तराध्ययन सूत्र के नौवें अध्ययन का आलम्बन लेते हुए मुनि ने कहा कि दुनिया मतलबी है।

आत्मा को कोई जला नहीं सकता, आंतरिक शत्रुओं से आत्मा की रक्षा करनी है, कषाय रूपी लुटेरों से आत्मा को बचाना है। तप रूपी अग्नि से विषय विकारों को जलाना है।

संयम भी परलोक के सुखों की कामना करते हुए नहीं लिया जाता है। धर्मसभा में चेन्नई के विजयसिंह पींचा, मंगलचंद भंसाली, यादगीर से गौतमचंद धोका सहित बेंगलूरु से चैनराज गोटावत, उगमराज बोहरा, रोशनलाल बाफणा उपस्थित थे।