
प्रो. संदीप शास्त्री, राजनीतिक विश्लेषक
राज्य विधानसभा के चुनाव में इस बार भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे के उलट रणनीति के सहारे एक-दूसरे को शिकस्त देने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा जहां राष्ट्रीय मुद्दों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, केंद्र सरकार की उपलब्धियों को लेकर चुनावी अभियान में जा रही है वहीं सत्तारुढ़ कांग्रेस स्थानीय मुद्दों पर टक्कर दे रही है।
दरअसल, वर्ष 2014 के बाद भाजपा का एक देश, एक नेता और केंद्र सरकार की उपलब्धियों का नारा काफी सफल रहा है। उन्होंने इसे हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, त्रिपुरा आदि राज्यों में आजमाया और सफल भी रहे हंै। इसलिए उसी फार्मूले को यहां भी आजमाएंगे। भाजपा का चुनावी अभियान राज्य स्तर पर नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जा रहा है। चाहे विकास की बात हो, धर्म की बात हो या नेतृत्व का प्रश्न हो। हर सवाल का जवाब वे राष्ट्रीय स्तर पर ही देना चाहते हैं। भाजपा यहां राज्य स्तरीय मुद्दों पर चुनाव में नहीं जाएगी क्योंकि उनके पांच साल के कार्य की छवि अब भी लोगों के मन में है। भाजपा को लगता है कि अगर वे स्थानीय स्तर पर चुनावी अभियान चलाएंगे और स्थानीय नेताओं को महत्व देंगे तो प्रदेश संगठन में समस्या उत्पन्न हो जाएगी। पार्टी के भीतर जो विभाजन है वह मुखर हो जाएगा। इसलिए नई दिल्ली से राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुने हुए नेता चुनाव तैयारियों का प्रबंधन सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तर पर कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर नेताओं की कोई बड़ी भूमिका नजर नहीं आती। भाजपा को अगर सफल होना है तो बस यही एक रास्ता है। अगर वे स्थानीय मुद्दे उठाएंगे तो वर्ष 2008 से 13 के बीच उनके शासनकाल की चर्चा भी शुरू हो जाएगी। इसलिए वे स्थानीय मुद्दों को जितना नजरअंदाज कर सकते हैं उसे कर रहे हैं। यह भाजपा की अपनी रणनीति है।
दूसरी तरफ कांग्रेस राष्ट्रीय नेतृत्व पर जोर नहीं दे रही है। हालांकि, राहुल गांधी चुनावी अभियान चला रहे हैं, लेकिन पोस्टर में उनके फोटो का आकार छोटा है और सिद्धरामय्या के बड़े फोटो लग रहे हैं। यह फार्मूला उन्होंने पंजाब में अमरिंदर सिंह के साथ आजमाया और अब कर्नाटकमें भी आजमा रहे हैं। पूरा फोकस स्थानीय स्तर पर है। राहुल गांधी ने एक साल पहले ही कह दिया कि यह चुनाव सिद्धरामय्या के नेतृत्व में लड़ेंगे। पहले के विपरीत राष्ट्रीय नेतृत्व के बजाय सब कुछ स्थानीय स्तर पर नियंत्रित हो रहा है। राहुल गांधी सिद्धरामय्या के निर्देश पर चल रहे हैं। चूंकि, कमान सिद्धरामय्या के हाथों है इसलिए उन्होंने तय किया है कि उनका पूरा फोकस स्थानीय मुद्दों पर होगा। भाजपा को जहां भी घेरना है स्थानीय मुद्दों पर ही घेरेंगे। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बी एस येड्डियूरप्पा को शिकस्त देने की यह सर्वश्रेष्ठ रणनीति है।
यह देखने वाली बात है कि जब से सिद्धरामय्या ने चुनावी अभियान की कमान संभाली है तब से वो एजेंडा तय कर रहे हैं और भाजपा उसके पीछे चल रही है। पहले एजेंडा भाजपा तय करती थी और कांग्रेस उसके पीछे चलती थी। इस बार उलटा हो रहा है। चाहे आप कर्नाटक के लिए अलग झंडे की बात करें या कर्नाटक गौरव की बात करें या बाहरी लोगों का मुद्दा हो, अपनी संस्कृति या अपनी भाषा की बात हो। इन मुद्दों को उठाकर सिद्धरामय्या बढ़त ले रहे हैं। छोटे शहरों में इसका स्पष्ट असर देखा जा रहा है। इसके साथ ही वे जातीय गोलबंदी भी कर रहे हैं। अल्पसंख्यक, पिछड़ा और दलित (अहिंदा) से आगे बढऩे की कोशिश कर रहे हैं और लिंगायत को अलग धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की कोशिश इसी के तहत है। हालांकि, यह कितना सफल होगा यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन, दोनों ही पार्टियां इस चुनाव में इसे भुनाने की कोशिश करेंगी। भाजपा इसे ङ्क्षहदू समाज में विभाजन पैदा करने के आरोपों को हवा देगी तो सिद्धरामय्या भाजपा के पारंपरिक वोट में सेंध लगाने की कोशिश करेंगे। कौन कितना सफल होगा यह देखना होगा। जहां तक सत्ता विरोधी लहर का प्रश्न है तो भाजपा ने ऐसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं उठाया है जिससे सत्ता विरोधी लहर दिखे।
अगर वो सत्ता विरोधी लहर उठाएं जैसे नरेंद्र मोदी ने 10 फीसदी सरकार या सीधा-रुपय्या सरकार कहा तो उसके तुरंत बाद जो प्रतिक्रिया होती है उसमें वर्ष 2008-13 के दौरान उनके शासनकाल को कटघरे में लाया जाता है। जिसका बचाव करना भाजपा के लिए मुश्किल हो रहा है। अगर यह चुनाव कांग्रेस जीत लेती है तो राष्ट्रीय स्तर पर इसका महत्व काफी बड़ा होगा। खासतौर पर वर्ष 2019 के आम चुनावों में बनने वाले राष्ट्रीय गठजोड़ के दृष्टिकोण से।
(जैसा कि पत्रिका से बातचीत में कहा)
Published on:
28 Mar 2018, 6:04 PM IST
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