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लंबे अंतराल के बाद दुबारा सीएम बनने वाले येड्डियूरप्पा तीसरे नेता

निजलिंगप्पा को चार साल और पाटिल को 20 साल बाद मिली थी दुबारा गद्दीयेड्डियूरप्पा को सात साल बाद दुबारा मौका

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बेंंगलूरु. बी एस येड्डियूरप्पा प्रदेश के तीसरे ऐसे नेता हैं जो लंबे अंतराल के बाद दुबारा मुख्यमंत्री बनेंगे। इससे पहले एस निजलिंगप्पा और वीरेंद्र पाटिल लंबे अंतराल के बाद दुबारा मुख्यमंत्री बन चुके हैं। अविभाजित कांग्रेस के आखिरी अध्यक्ष रहे एस निजलिंगप्पा चार साल के अंतराल के बाद दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि, इस बीच में दो मुख्यमंत्री रहे। 1956 व 1967 में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस ने निजलिंगप्पा को मुख्यमंत्री बनाया था और दोनों ही बार सत्ता में वापसी पर उन्हें गद्दी मिली लेकिन वे 4 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बावजूद पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।

1956 में मैसूरु प्रांत के पुनर्गठन के बाद निजलिंगप्पा 1 नवम्बर 1956 को मुख्यमंत्री बने थे और 16 मई 1958 तक पद पर रहे। इसके करीब चार साल बाद निजलिंगप्पा को कांग्रेस ने फिर 21 जून 1962 को विधानसभा चुनाव से ऐन मुख्यमंत्री बनाया। पिछली बार की तरह इस बार कांग्रेस चुनाव में जीती और निजलिंगप्पा 28 मई 1968 तक पद पर रहे। निजलिंगप्पा 2726 दिन मुख्यमंत्री रहे। निजलिंगप्पा के बाद ऐसा कीर्तिमान लिंगायत समुदाय के दिग्गज नेता वीरेंद्र पाटिल के नाम है। पाटिल 20 साल के लंबे अंतराल के बाद दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। संयोगवश निजलिंगप्पा की विदाई के बाद पाटिल को ही गद्दी मिली थी। पाटिल पहली बार 29 मई 1968 को मुख्यमंत्री बने थे और 18 मार्च 1971 तक पद पर रहे। पाटिल को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का विश्वास पात्र माना था, लेकिन बाद में इंदिरा और पाटिल के रिश्ते में खटास आ गई।

जब वर्ष 1977 में रायबरेली से चुनाव हार चुकी इंदिरा गांधी की वर्ष 1978 के चिकमगलूर उपचुनाव में जीत से ही राष्ट्रीय राजनीति में वापसी हुई थी। इसके लिए कांग्रेस सांसद डी बी चंद्रेगौड़ा ने सीट खाली की थी। चंद्रेगौड़ा बाद में भाजपा में आ गए। पाटिल ने इस चुनाव में इंदिरा गांधी के खिलाफ जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। हालांकि, चुनाव में इंदिरा एक लाख से अधिक मतों के अंतर से जीत गई थीं। बाद में पाटिल कांग्रेस में लौट आए और केंद्र में मंत्री भी बने। 1989 में फिर पलटी जब जनता दल नेता एसआर बोम्मई की सरकार की बर्खास्तगी के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस जीती। राजीव गांधी ने पाटिल को फिर से मुख्यमंत्री बनवा दिया, लेकिन राजीव की पाटिल के साथ मधुर संबंध ज्यादा दिनों तक नहीं चले और पाटिल ने राजीव के खिलाफ एक तरह से बगावत का बिगुल फूंक दिया।

राजनीतिक उठापटक के बीच कांग्रेस आलाकमान ने उनकी जगह एस बंगारप्पा की ताजपोशी कर दी। पाटिल की विदाई ने प्रदेश की राजनीतिक के जातीय समीकरण में काफी बदल दिया। लिंगायत समुदाय कांग्रेस से काफी नाराज हो गया और इसके बाद ही प्रदेश मेंं कांग्रेस की जमीन कमजोर होने लगी। लिंगायतों की कांग्रेस से दूरी का एक कारण पाटिल की विदाई को भी माना जाता है। येड्डियूरप्पा पहली बार 2007 में 20 महीने पुराने भाजपा-जद (ध) गठबंधन में मुख्यमंत्री बन थे, लेकिन सिर्फ 7 दिन तक पद पर रह पाए।

जद ध के समर्थन वापस लेने के कारण येड्डियूरप्पा की सरकार गिर गई और नए चुनाव हुए। इसके बाद 2008 में हुए चुनाव में भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई और येड्डियूरप्पा दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण उन्हें 4 अगस्त 2011 को पद छोडऩा पड़ा। दो कार्यकाल में येड्डियूरप्पा 1160 दिन पद पर रहे। सात साल बाद येड्डियूरप्पा की ताजपोशी एक बार फिर मुख्यमंत्री के तौर पर होगी।

लिपिक से लेकर सीएम का तक का सफर
बुनकेरे सिद्धलिंगप्पा येड्डियूरप्पा का जन्म 27 फरवरी 1943 को मण्ड्या जिले में केआरपेट तालुक के बोकनकेरे गांव में हुआ। उन्होंने पीयूसी की शिक्षा पीईएस कॉलेज मंड्या से हासिल की। 1965 में वह समाज कल्याण विभाग में क्लर्क नियुक्त हुए, लेकिन थोड़े ही दिनों में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और शिवमोग्गा जिले के शिकारीपुर चले गए, जहां एक चावल मिलन में क्लर्क बन गए। कॉलेज के दिनों से ही वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े और सत्तर के दशक की शुरुआत में शिकारीपुर इकाई के कार्यवाह बनाए गए। कुछ ही साल बाद 1972 में जन संघ के तालुक अध्यक्ष बने और यहीं से उनका राजनैतिक जीवन शुरू हुआ। 1983 में पहली बार शिकारीपुर से विधायक निर्वाचित हुए। 1985 में भाजपा के जिला अध्यक्ष और 1988 में प्रदेश अध्यक्ष बने।