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बांसवाड़ा : सरहद और पैदाइश से गुजराती, जुबां और जीवन में रचा-बसा वागड़

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बांसवाड़ा : सरहद और पैदाइश से गुजराती, जुबां और जीवन में रचा-बसा वागड़

आशीष बाजपेई. बांसवाड़ा. सीमा, राज्य की हो या देश की इससे सटे गांवों में पड़ोसी राज्य या देश के रहन-सहन खानपान का असर दिखलाई पडऩा कोई नई बात नहीं है। लेकिन राजस्थान की सीमा पर बसे गुजरात के गांव फतेहपुरा के लोगों में वागड़ की आबोहवा रच बस रही है। यहां के लोग मूलता गुजरात के ही हैं और गुजरात में ही जीवन यापन कर रहे हैं, लेकिन उनकी बातचीत और रहन-सहन में गुजरात का कोई पुट दिखलाई नहीं पड़ता। फतेहपुरा में बसे गुजराती परिवार से बातचीत की रिपोर्ट -

भरते हैं गुजराती होने का दंभ
वैसे तो यह जगजाहिर है कि गुजरात के लोग कहीं पर भी रहें, लेकिन उनका खानपान और रहनसहन गुजरात का ही होता है। गुजराती भाषा का ही उपयोग करते हैं। लेकिन फतहपुरा में तस्वीर उलट है। राजस्थान की सीमा खत्म होते ही इनके घर का प्रांगण शुरू हो जाता है। कागजों की मानें तो इस मकान के मालिक ईश्वर मूलता गुजरात के रहने वाले हंैं। खुद को गुजराती बताने वाले परिवार का खान-पान व रहन-सहन तक सब कुछ वागड़ का है। हालांकि खरीदारी या अन्य कार्य के लिए लोग फतेहपुरा के बाजार का रुख करते हैं।

‘नहीं आती गुजराती’
परिवार के मुखिया ईश्वर पुत्र खातरा बताते हैं कि उनके सात बच्चे हैं। उनमें से एक बच्चा साथ रहकर पढ़ाई कर रहा है। और शेष अन्य कामकाज के सिलसिले में गुजरात के बड़े शहरों में निवासरत हैं। वे सभी तो गुजराती भलीभांति जानते हैं, लेकिन वे और उनकी पत्नी को गुजराती नहीं आती है। वे सिर्फ वागड़ी बोलते हैं। पूछने पर बताते हैं कि उन्हें गुजराती से ज्यादा वागड़ी रास आती है। और रहनसहन भी। यही कारण है कि कभी गुजराती बोली और रंगढंग सीखने पर जोर भी नहीं दिया। ईश्वर बातते हैं कि उनके काका-बाबा के भाई नानजी, चम्पा उनके घर से कुछ दूरी पर रहते हैं। उनके भी यही हाल हैं। उन्हें भी गुजराती कम ही रास आती है और उनका परिवार भी वागड़ी ही बोलता है।

इधर तीन भाषाओं का मिठास
फतेहपुरा से जब टीम दूसरे सरहदी गांव बांसवाड़ा जिले के गडूली पहुंची तो तस्वीर अलग थी। ग्रामीण सुरमाल बताते हैं कि गांव में तकरीबन 90 फीसदी लोग ऐसे हैं, जिन्हें गुजराती भाषा में अच्छी खासी पकड़ है, लेकिन ये वागड़ी और हिन्दी भी अच्छी तरह से बोलते हैं। गांव के पंकज और राजेश बताते हैं कि बांसवाड़ा के इन स्थानीय निवासियों को जहां वागड़ी से प्रेम हैं वहीं, इन्हें गुजराती भी भलिभांति आती है। यहां के लोग बचपन से ही गुजरात आना जाना शुरू कर देते हैं। इस कारण गुजराती भाषा पर पकड़ बन जाती है।

घर आंगन की तरह गुजरात सीमा
गडूली सरपंच पति मनोज मछार बताते हैं गुजरात सीमा करीब होने के कारण खरीदारी, उपचार आदि पर गुजरात पर निर्भर हैँ। आना जाना अधिक होने, नाते रिश्तेदारी होने के कारण गुजरात का प्रभाव अधिक है। बोली के अलावा खान-पान में भी गुजराती असर दिखता है। गुजराती समझने और सीखने में खास दिक्कत भी नहीं आती।