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किसान दिवस पर विशेष : खेत बर्बाद और किसान बदहाल, माही की नहरें भी खस्ताहाल

किसानों की हो रही अनदेखी, नजर नहीं आ रहे सुधार के प्रयास
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बांसवाड़ा

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Ashish Bajpai

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Updated: 23 Dec 2017, 9:14 PM IST

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बांसवाड़ा. कहीं सीपेज से खेत-खलिहान पानी से लबालब तो कहीं पानी नहीं पहुंचने से छाई विरानी। माही बांध के लबालब होने के बावजूद लाखों हैक्टेयर जमीन आजादी के 70 साल बाद भी असिंचित जमीन का दाग अभी तक नहीं मिट पाया है। जिले को काले पानी के नाम से मुक्त करने वाली माही की नहरें अब किसानों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही हैं। बावजूद इसके किसानों की बदहाल स्थिति को सुधारने के लिए कोई प्रयास नजर नहीं आ रहा है। सीपेज के चलते जहां करीब 25 हजार हैक्टेयर में बुवाई करना मुश्किल हो रहा है तो करीब 5 हजार हैक्टेयर जमीन पर फसल इसलिए नहीं हो पा रही है कि यहां अभी तक माही का पानी नहीं पहुंचा है।

सीपेज से खत्म हो रहे हैं खेत

माही बांध का पानी खेतों तक पहुंचाने के लिए करीब 2500 किमी लम्बी नहरी तन्त्र समय के साथ पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है, जिसके चलते करीब 20 टीएमसी से अधिक पानी खेतों तक नहीं पहुंच कर नदी-नालों में बह रहा है। वहीं इससे सैकड़ों खेत सीपेज के पानी से लबालब हो गए हैं जिससे खेतों की उर्वरा शक्ति लगभग समाप्त हो गई है इसके चलते यहां पूरे साल एक दाना नहीं हो पाता। जानकारी के अनुसार 50 फीसदी से अधिक नहरें जर्जर हो गई हैं, इसके चलते जहां केवल 20-25 टीमएसी पानी में ही रबी की खेती हो जानी चाहिए , लेकिन वर्तमान में इसके लिए 40 टीएमसी से अधिक पानी दिया जा रहा है।

बद से बदतर स्थिति

जहां एक तरफ दुकवाड़ा और मोर बोरदा सहित आस-पास क्षेत्रों में माही का पानी नहीं पहुंचने से जमीन सुखी पड़ी हुई है, वहीं सांसद के गृह क्षेत्र कानजी का गढ़ा के लखेरिया गांव में सीपेज के चलते सैकड़ों बीघा खेत पानी में डूबे हुए हैं। इसी तरह डडूका, मलाना, झडस ग्राम पंचायतों से गुजर रही परसोलिया माईनर में हुए सीपेज के चलते करीब 500 बीघा जमीन बंजर पर तो फसल नहीं हो पा रही है और 300 बीघा से अधिक जमीन बंजर होने के कगार पर है।

तीन लाख हैक्टेयर भी बन सकती है सिंचित

जिले में करीब साढ़े चार लाख हैक्टेयर जमीन पर खेती की जा सकती है और वर्तमान में सवा लाख हैक्टेयर ही सिंचित
श्रेणी में आता है। इसमें से 80 हजार हैक्टेयर भूमि माही बांध के पानी से एवं शेष जमीन अन्य जलस्त्रोतों से सिंचित हो रही है। जनजाति क्षेत्र में किसानों के प्रति राज्य सरकार की उपेक्षापूर्ण स्थिति यह है कि अभी तक जिले की करीब आधी आबादी कुशलगढ़, सज्जनगढ़ और आनन्दपुरी का कुछ हिस्सा माही के पानी से महरूम है। किसानों के प्रति बैरुखी का आलम यह है कि जिले में तीन लाख किसान होने के बावजूद करीब 40 साल से मण्डी वीरानी छाई हुई है। इसके चलते न तो किसानों से गेहूं और सोयाबीन फसल की खरीदी समर्थन मूल्य पर खरीदी नहीं हो रही है, जिसके चलते किसानों को आर्थिक नुकसान हो रहा है।

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